प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा क़ानून धोखा है

प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को लेकर जन चेतना ने लोक सहभागी मंच एवं भोजन अधिकार अभियान के साथ मिल कर 10 से 15 अक्टूबर तक रायगढ़ के पांच विकास खंडों में रायशुमारी का कार्यक्रम चलाया। कार्यक्रम के पांच पड़ावों में 140 गांवों के लोगों की हिस्सेदारी रही। पेश है सविता रथ की रिपोर्ट;
रायगढ़ के पांच ब्लाकों में हुए पांच दिवसीय अभियान ने साफ़ कर दिया कि लोगों को पता ही नहीं था कि सरकार ऐसा कोई क़ानून बनाने जा रही है। लोगों को यह जान कर धक्का लगा कि सरकार ऐसा जन विरोधी कानून भी बना सकती है, कि भूख के सवाल पर राजनीति कर सकती है। 
सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी ने कहा कि ऊर्जा संयंत्र, खदान, बांध और अभ्यारण्य के नाम पर सरकार अनुसूची 5 के तहत आनेवाली भूमि का जबरिया अधिग्रहण कर रही है। इसके लिए ग्राम सभा की अनुमति की शर्त को भी दरकिनार किया जा रहा है। इससे खेती की ज़मीन लगातार कम होती जा रही है। पेयजल के स्रोतों को भी उद्योगों के हवाले किया जा रहा है। दूसरी तरफ सरकार खाद्य सुरक्षा का भी नारा उछाल रही है।   

बहिरकेला गांव के मुखिया अंगद राठिया ने कहा कि सरकार कोयला निकालने के लिए कृषि जमीनों को छीन कर हमें कृषक से मजदूर बनाने में तुली है। दूसरी ओर अनाज के बदले पैसा देकर हमें दोहरी सजा देने की तैयारी कर रही है। यह खाद्य सुरक्षा को बाज़ार के हवाले कर देना है। 

कई गांवों के लोगों ने कहा कि इस कानून का विरोध ग्राम सभा में प्रस्ताव लाकर किया जायेगा। स्कूल और आंगनबाड़ी में पैकेटबंद भोजन समेत अनाज के बदले पैसा या कूपन दिये जाने का विरोध किया जायेगा। जानकी बाई का कहना है कि यदि अनाज के बदले पेसा दिया गया तो भोजन महिलाओं और बच्चों की पहुंच के बाहर चला जाएगा। 

लोगों की मांग है कि उचित मूल्य की दुकानों का लोक व्यापीकरण हो, राशन की दुकान में रोजमर्रा की वस्तुओं को स्थानीय उपज के अनुसार खरीदी हो, हर गांव में मंडी बने। शेख मोहम्मद अख्तर ने खाद्य सुरक्षा के तहत बेघर, बेसहारा तथा विकलांग लोगों के साथ पूरा न्याय किये जाने की पैरवी की। 

आयोजन से निकले प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं; 
जो ज़मीन धोखाधड़ी से और जबरिया छीनी गयी है, उसे लौटाने का प्रावधान होना चाहिए। 
एपीएल और बीपीएल की श्रेणी ख़त्म होनी चाहिए।
प्रतिव्यक्ति के हिसाब से पोषण सुरक्षा दी जानी चाहिए।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली का विस्तार होना चाहिए।
स्थानीय खरीदी और भंडारण की व्यवस्था होनी चाहिए। 
बच्चों के भोजन और पोषण के अधिकार को बेहतर ढंग से सुनिश्चित किया जाये। 
वंचित एवं बहिष्कृतों के अधिकारों के लिए विशेष प्रावधान हों।
अनाज के बदले नगद या कूपन दिये जाने पर रोक लगे। 
प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सजा, जुर्माना एवं मुआवजे का प्रावधान हो।
मातृत्व हकों में न्यूनतम मजदूरी की दर के आधार पर आर्थिक सहायता बिना किसी शर्त के मिले। 
सामाजिक सुरक्षा पेंशन को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। 50 साल से ऊपर की उम्र के लोगों को मनरेगा की 15 दिन की मज़दूरी पेंशन के रूप में मिलनी चाहिए। 
सभी तरह के विकलांगों को खाद्य सुरक्षा का विशेष लाभ मिलना चाहिए। 

कार्यक्रम के समापन पर अब तक सामने आये मुद्दों को लेकर हस्ताक्षर अभियान की शुरूआत हुई। इस मौक़े पर प्रोफेसर रमेश चन्द्र ने कहा कि इसे समझने की ज़रूरत है कि देश के गोदामों में अनाज की कोई कमी नहीं तो फिर लोग भूखे क्यों हैं। पीयूसीएल की महासचिव कविता श्रीवास्तव ने कहा कि सरकार यह मानने को तैयार नहीं कि देश में भूख और कुपोषण की स्थिति है, कि किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं। गंगाराम पैकरा ने कहा कि बेहतरी के लिए लोगों का सामने आना बहुत ज़रूरी है। इसी कड़ी में अंकिता अग्रवाल ने युवाओं से अपील की कि वे सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ अपनी पूरी ताक़त लगायें। 

समापन कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुप्रीम कोर्ट के सलाहकार बलराम ने कहा कि खाद्य सुरक्षा का मसौदा वे लोग तैयार कर रहे हैं जिनका गरीबी और भूख से दूर-दूर तक का नाता नहीं है और वही हमारे भाग्यविधाता बन गये हैं। यह दुखद है।

(लेखिका उद्योगों के चलते हो रहे विस्थापन और प्रदूषण के ख़िलाफ़ पिछले सात सालों से रायगढ़ में सक्रिय जन चेतना से जुड़ी हैं और सामुदायिक पत्रकार हैं)  


                                                                         

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