खेती की ज़मीन का अधिग्रहण जन विरोधी काम

करछना (इलाहाबाद) में जेपी पावर प्लांट प्रस्तावित है। इसके लिए 2010 में 22 सौ बीघा ज़मीन अधिग्रहीत की गयी। सरकार ने ज़मीन का मुआवज़ा बाज़ार दर से दस गुना कम तय किया- कुल तीन लाख रूपये प्रति बीघा जबकि तब ज़मीन का बाज़ार भाव था 30 लाख रूपये प्रति बीघा। इस मुद्दे पर अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा दूसरे संगठनों के साथ मिल कर संघर्षरत है। इस अन्याय के ख़िलाफ़ चल रहे किसानों के तीखे विरोध का नतीज़ा है कि उक्त ज़मीन की घेराबंदी भी पूरी नहीं की जा सकी है। इसी रोशनी में पेश है डा. आशीष मित्तल की टिप्पणी;

केन्द्र सरकार के भूमि अधिग्रहण के ताजा प्रस्ताव की कड़े शब्दों में निन्दा की जानी चाहिए। शरद पवार पैनल का 67 फीसदी लोगों की अनुमति लेने व सोनिया गांधी के 80 फीसदी स्वीकृति का प्रस्ताव जनविरोधी है। खेती की जमीन पर उद्योग लगाना, बड़े बांध बनाना और शहरीकरण करना विदेशी कम्पनियों, माफिया व दलालों के पक्ष में काम करना है और जनता के हित की अनदेखी करना है। इससे बेरोजगारी बढ़ेगी और जनता की जीविका के छोटे साधन बड़े पैसे के सौदागरों व अन्तर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों के हाथ में चली जाएगी।

भारत की खेती की जमीन उदारीकरण के दौर में घटती जा रही है जहां लगभग 50 फीसदी भारत का भूभाग खेती के लिए प्रयुक्त होता है। 1966 में यह 1153 लाख हेक्टेअर था जो 1980-81 व 1990-91 में बढ़ कर क्रमश: 1266.7 व 1278.4 लाख हेक्टेअर हो गया। भारत में लगभग 1590 लाख हेक्टेअर जमीन खेती योग्य मानी जाती है। पर भारत के प्राकृतिक संसाधनों को उदारीकरण के दौर में विदेशियों को बेचने की होड़ में भारत के शासक वर्गों ने इस खेती योग्य भूभाग को बढ़ाने की जगह और घटा दिया। 2003-04 में यह 1233.2 लाख हेक्टेअर रह गया।

सरकार द्वारा विदेशी निवेश के माहौल को सुधारने की होड़ में भूमि की दरें तेजी से बढ़ी हैं और कृषि भूमि का अनुपयोगी इस्तेमाल बढ़ता चला गया है। आज खेतों में फसलों की जगह कंक्रीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं। इसके कारण खाद्य असुरक्षा, ग़रीबी और भुखमरी बढ़ी है। महत्वपूर्ण है कि अनाज के उत्पादन के अन्तर्गत क्षेत्रफल इस हाल के दौर में और तेजी से घटा है। 2007-08 में 1240.68 लाख हेक्टेअर में अनाज पैदा होता था जो 2008-09 में घट कर 1228.32 और 2009-10 में केवल 1213.66 लाख हेक्टेअर रह गया।

देश की खाद्यान्न सुरक्षा की हालत बेहद चैंकाने वाली है और प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता लगभग 1955-60 के दौर जैसे हालात में पहुंच चुकी है। 1951 में प्रति व्यक्ति खाद्य उपलब्धता 394 ग्राम थी जो 1956 में बढ़ कर 430.7 ग्राम हो गयी और 1980 के दशक में बढ़ कर 510 ग्राम हो गयी। हाल में यह घटते-घटते 2008 में 436 ग्राम रह गयी। यह गिरावट लगातार जारी है।

प्राकृतिक संसाधनों को कौड़ी के दाम बेचना बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और साम्राज्यवादी देशों की मांग का हिस्सा है जिसके आधार पर वो भारत में निवेश करने के लिए राजी हो रही हैं। भारत सरकार जो डालर संग्रह के लिए बेहद भूखी रहती है, इन शर्तों को स्वीकार करके खेती की जमीन, वन, जल व खनिज आदि संसाधनों को इन कम्पनियों को बेचने को राजी है और इसे भारत का विकास प्रचारित कर रही है। इस डालर आमदनी का बड़ा हिस्सा विदेशों में अनुपयोगी खर्च में जाता है जिसमें हथियारों की खरीद और उनके लिए दिया गया भारी कमीशन शामिल है। विदेशों में जमा तमाम काला धन लाखों करोड़ डालर है और इस डालर का सारा बोझ भारत की जनता पर पड़ रहा है जिसे अपनी जीविका के संसाधन अधिग्रहीत कराकर इसकी कीमत अदा करनी पड़ रही है।

हमारी मांग है कि भूमि अधिग्रहण का ताजा प्रस्ताव फ़ौरन वापस लिया जाए। इसके लिए लोगों से है कि वे खेती की जमीन पर उद्योग लगाने का पुरज़ोर विरोध करें और खेती की सारी अधिग्रहीत जमीन वापस किये जाने के लिए संघर्ष करें। सरकार पर दबाव बनायें कि वह मुफ्त में सिंचाई, जल संरक्षण, भूमि वितरण, सस्ती खाद, बीज आदि की व्यवस्था करे, कि औद्योगिक विकास का कार्य बन्द उद्योगों की जमीन पर या गैर खेती की जमीन पर ही किये जाने का फ़ैसला करे।

 (लेखक पेशे से चिकित्सक हैं और अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के सचिव हैं)
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