डॉक्टर सुनीलम की सजा और दयामनी बारला की गिरफ्तारी पर संयुक्त वक्तव्य

पीयूसीएल, सोशलिस्ट फ्रंट, इंसाफ, वाटर राइट कैंपेन, आर जे डी, डी एन ए मुंबई, इंडियन सोशलिस्ट जैसे संगठनों और चितरंजन सिंह, अनिल चौधरी, विजय प्रताप, विल डिकोस्टा, किरन शाहीन, असित दास, रजनी कांत मुदगल, संजय कनोजिया, गंगाधर पाटिल, जैसे वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने डॉ सुनीलम और दयामनी बारला की रिहाई के लिए यह साझा अपील जारी की  है. 

हम आपसे अनुरोध करते हैं कि इसे ई-मेल और फेसबुक इत्यादि के द्वारा अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं: 
साथियों,
हम सभी डॉक्टर सुनीलम की सजा और दयामनी बारला की गिरफ्तारी  पर दुख  प्रकट करते  हुए इस अपील पर हस्तारक्षर कर रहे हैं। बड़े दुख की बात है  कि  सरकार द्वारा लगातार जन आंदोलनों  को दबाया जा रहा है और कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए सरकारें  लोकतांत्रिक  होने के झूठे दावों को भी छोड़ चुकी हैं। गुजरते हुए हर दिन के साथ सभी ईमानदारी से चल रहे किसान, मजदूर, आदिवासी, और अन्य प्रकार के तमाम आंदोलनों, समाजिक संगठनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। आंदोलन से जुड़े लोग भुखमरी की कगार पर खड़े हुए हैं, विस्थापन का दंष सह रहे हैं और बड़े पैमाने पर आत्महत्या करने पर विवष हो रहे हैं। सरकार और प्रशासन द्वारा जन आंदोलनों पर बनाया जा रहा यह दबाव उनके औपनिवेशिक आकाओं और बड़े पूंजीपतियों के इशारे पर बनाया जा रहा है। बिनायक सेन और सीमा आजाद को अदालत द्वारा  आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। इनको दलित आंदोलनों को समर्थन देने का दोशी पाया गया था। पॉस्को और कुडनकुलम का विरोध कर रहे हजारों आंदोलकारियों पर झूठे मामले थोप दिए गए हैं। यह सूची बहुत लंबी है और इसमें सबसे ताजा मामला डॉक्टर सुनीलम और दयामनी बारला का है।

मध्य प्रदेश के जनवादी राजनीतिज्ञ डॉक्टर सुनीलम को सजा दिया जाना गहरी चिंता का विषय और निराशाजनक  है। यह न्याया तंत्र को गुमराह कर जनहित के लिए उठने वाली आवाज को खामोश करने और क्षमतावानों के हित साधने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का एक हिस्सा है। डॉक्टर सुनीलम देश में भ्रष्टाचार के विरोध में चल रहे आंदोलन और डब्ल्यू एच ओ के खिलाफ चल रहे आंदोलन में इंडियन पीपुल्स मूवमेंट का हिस्सा रहे हैं। पूर्व विधायक और किसान संघर्ष  समीति के अध्यक्ष डॉक्टर सुनीलम ने किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। देश के किसान आंदोलन के इतिहास में 12 जनवरी, 1998 एक काला दिवस था क्योंकि इसी दिन दिगविजय सिंह के नेतृत्व वाली मध्य प्रदेश की राज्य सरकार ने इस शांतिपूर्वक चल रहे किसान आंदोलन को पुलिस का सहरा लेते हुए जबरन कुचलने का प्रयास किया। डॉक्टर सुनीलम की पिछली जिंदगी को देखते हुए और उनके कार्यो का संज्ञान लेते हुए उन सभी नागरिकों से अपील है जो लोकतंत्र से प्रेम करते हैं और नागरिकों की स्वतंत्रता में विश्वास रखते हैं कि वे डॉक्टर सुनीलम का समर्थन करें।

दयामनी बारला मामले में जो एक पत्रकार से आदिवासी आंदोलनकारी बनी है, आदिवासी विस्थपन के विरोध में और उनके अधिकारों के लिए झारखंड डमें लड़ाई लड़ रही हैं। आदिवासी महिला आंदोलकारी के रूप में वे लोक हित का कार्य कर रही हैं। उन्हें रांची की एक अदालत द्वारा 18 अक्टूबर, 2012 को जमानत मिली थी। इसके बावजूद उन्हें फिर से बंदी बना लिया गया है, बारला के जो साथी उनसे मिलकर आए हैं उन्होंने बताया कि उन्हें नगादी मामले में बंदी बनाया गया था और छोड़ा नही जा सकता। उन्हे 16 अक्टूबर , 2012 को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में जेल भेजा गया था। इससे पहले उन्होंने 25 अप्रेल,2006 के एक मामले में अदालत के सामनंे आत्मसमर्पण किया था। यह पहला अवसर नहीं है जबकि उन्हे पीड़ित किया जा रहा है, बल्कि सरकार उन्हें निशाना बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ती है। हाल ही में उनकी गिरफ्तारी उनके द्वारा चलाए जा रहे शांतिपूर्वक आंदोलन की सफलता के कारण हुई है। यह आंदोलन  रांची से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित नगारी गांव में  उपजाउ भूमि को अधिग्रहण से बचाने के विरोध में चलाया जा रहा है जो पूरी तरह शांतिपूर्ण है और कभी भी पुलिस को गोली चलाने की नौबत नहीं आई है। इस स्थान पर सरकार आई आई एम, आई आई टी और नेशनल लॉ कॉलेज बनाना चाहती है। सरकार किसी भी कीमत पर और किसी भी तरह इस आंदोलन को समाप्त करने की पूरी कोशिष कर रही है।

यह केवल डॉक्टर सुनीलम और दयामनी बारला का मामला नहीं है। आंदोलकारियों का उत्पीड़न और उनपर झूठे मामले थोपकर कानून और सत्ता का दुरूप्योग कर जन आंदोलनों को नुकसान पहुंचाना ताकि वे कमजोर पड़ सकें एक चलन सा हो गया है।

हम डॉक्टर सुनीलम और दयामनी बारला के खिलाफ इस कायरतापूर्वक कार्य और गिरफ्तारी की निंदा करते हैं और मध्य प्रदेश व झारखंड की सरकार से मांग करते हैं कि इन दोनों के खिलाफ लगाए गए सभी मामलों को बिना शर्त वापस लें और उन्हें तुरंत रिहा करें।

चितरंजन सिंह               पी यू सी एल
अनिल चौधरी                पीस दिल्ली
विजय प्रताप                 सोशलिस्ट फ्रंट
विल डिकोस्टा                इंसाफ दिल्ली
किरन शाहीन              वाटर राइट कैंपेन
असित दास                लेखक एवं एंक्टिविस्ट दिल्ली
रजनी कांत मुदगल           सोशलिस्ट फ्रंट
संजय कनोजिया              आर जे डी
गंगाधर पाटिल                डी एन ए मुंबई
राजीव कुमार                 इंडियन सोशलिस्ट

 
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