हुल-1 लघु जल विद्युत परियोजना के विरोध में चम्बा में प्रदर्शन

हुल-1 लघु जल विद्युत परियोजना के  विरोध में चम्बा में  4 अक्तुबर 2012 को जिलाधीश कार्यालय के बाहर प्रदर्शन व एक दिन की भूख हड़ताल
साल घाटी निवासी 2003 से हुल-1 लघु जल विद्युत परियोजना के विरोध में संघर्ष करते रहे हैं। आप सब जानते हैं कि दिनांक 14.02.2010 को हमारी एक बैठक में कम्पनी के ठेकेदारों, गुण्ड़ों व शरारती तत्व द्वारा घातक हथियारों से हम पर हमला किया था। इस हमले में हमारे कई साथी घायल हुए। इस घटना के बाद प्रशासन ने ए डी एम चम्बा की अध्यक्षता में जांच कमेटी का गठन किया। इस कमेटी ने हमलावार षरारती तत्वों को कम्पनी के इशरे पर स्थानीय लोगों की चल रही षान्तिपूर्ण विरोध बैठक पर घातक हथियारों से हमला करने के लिए जिम्मेवार ठहराया तथा परियोजना को जन विरोध व कानून व्यवस्था के कारण रद्द करने की सिफारिश की। इसी आधार पर जिलाधीश ने भी राज्य सरकार को परियोजन रद्द करने की सिफारिश की। राज्य सरकार ने दिनांक 25/8/20100 इस पर कम्पनी को शो कॉज नोटिस जारी किया कि उक्त कारणों के आधार पर क्यों न यह परियोजना रद्द की जाए?
 उक्त शरारती तत्वों द्वारा हमला करने पर उन के खिलाफ स्थानीय सैशंन कोर्ट में मुकदमा चला। जिस में उन्हें 1,50,000 रूपय का जुर्माना किया गया। इस दौरान कम्पनी ने स्थानीय लोगों पर कई झुठे मुकदमें भी दायर किए, जिस पर इस कोर्ट ने उन्हें वापिस करने का भी निर्देष दिया। पूरे हिमाचल प्रदेश में कम्पनी के गून्ड़ों द्वारा साल घाटी बचाओ मोर्चा की बैठक में किए गए हमले का विरोध किया गया व धरना- प्रदर्शन भी हुए। इस के बाद कम्पनी इस मामले को उच्च न्यायलय षिमला में ले गई। जिस में कोर्ट ने कोई स्पष्ट फैसला न ले कर जनता के शन्तिपूर्ण विरोध करने के अधिकार को माना तथा कम्पनी के निर्माण कार्य को पुलिस संरक्षण में जारी रखने का निर्देश दिया। हमने भी उच्च न्यायलय में पटीषन दायर की जिस पर कोर्ट ने जिलाधीष की एक बार हॉं और फिर दुसरी बार परियोजन रद करने की सिफारिष पर विरोधाभास जताते हुए पटीशन खरीज कर दी। कोर्ट के इस फैसले से स्थानीय जनता को भारी निराशा हुई और उच्चतम न्यायलय दिल्ली में केस (SLP) दायर कर दिया गया। उच्चतम न्यायलय के दिनांक 3/9/2012 के आदेष में राज्य सरकार को निर्देश दिए गए कि सरकार द्वारा जारी दिनांक25/8/2010 केशों का्ॅज नोटिस के मूताविक अगामी कार्यवाही व कानूनानुसार फैसले की प्रक्रिया पूरी की जाए तथा उच्च न्यायलय के निर्देष सरकार के इस फैसले पर वाघ्यकारी नहीं होंगा, परन्तु अन्तिम फैसला उच्चतम न्यायलय का ही होगा।

 हमले के दिन के बाद परियोजना का काम बन्द रहा। 12 अप्रैल से 12 अगस्त 2011 तक लोगों ने जडेरा में सड़क पर चार महिना परियोजना बन्द करने के लिए धरना जारी रखा। 15 अगस्त 2011 को फिर कम्पनी के लोग परियोजना स्थल पर झण्ड़ा फैराने आए, जिन्हें लोगों ने खदेड़ दिया।

कुछ दिनों पहले तक निर्माण कार्य बन्द था परन्तु अब फिर से कम्पनीं ने काम षुरू कर दिया है। जनता ने इस का तुरन्त विरोध किया और चम्बा षहर में प्रदर्षन कर के जिलाधीष को काम बन्द करने का मांग पत्र दिया। मुख्यमन्त्री से षिमला जा कर भी मिले परन्तु आष्वासन के बावजूद, इस पर अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। 

बजाए काम बन्द करने के कम्पनीं ने अपने करींदे सेे जडेरा पंचायत के उपप्रधान के खिलाफ झुठा केस दायर कर दिया कि उस ने मजदूरों को धमकाया। यह सब जानते हैं कि हम मजदूरों के खिलाफ नहीं हैं, हमारी लड़ाई तो कम्पनी व परियोजना के विरूध है। अभी जो काम कम्पनीं करा रही है, वह उन्ही लोगों के हाथों में है, जिन्हों ने हम पर हमला किया था। कुछ महिलाओं के खेतों की खड़ी फसल काट दी है परन्तु पुलिस को सूचना देने के दस दिन बाद भी अभी तक दोषियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई है। साल घाटी बचाओ मोर्चा का प्रतिनिधि मण्ड़ल जिलाधीष व पुलिस अधिक्षक से 29/9/2012 को फिर से मिला तथा उच्चतम न्यायलय के फैसले तक काम बन्द करने का अनुरोध किया।

हाल की इन सब घटनाओं को देख कर लगता है कि सरकार, प्रशसन व कम्पनीं लोगो को जानबूझ कर उकसा रही है। सरकार जन विरोध को देखते हुए परियोजना रद करने व उन्हीं द्वारा जारी शो कॉज नोटिस की प्रक्रिया को पूरा करने पर गंम्भीर नहीं लगती है। एैसा लगता है कि प्रदेश सरकार व प्रषासन जन भावना का निरादर कर के कम्पनिंयों के हितों की पैरोकारी के लिए तत्पर है। यह आज हम सब के लिए चिन्तनीय मसला है कि हिमाचल में चुनाव सिर पर होने के बावजूद लोकतंत्र के ये अगुआ, खास कर राजनैतिक दल जन भावना से नहीं डरते। इस लिए साल घाटी बचाओ संघर्ष मोर्चा के अवाहन पर 4 अक्तुबर 2012 को चम्बा शहर में जिलाधीश कार्यालय के बाहर प्रदर्शन व एक दिन की भूख हड़ताल, हुल-1 परियोजना बन्द करो, की मांग को ले कर किया जा रहा है। -गुमान सिंह, हिमालय निति अभियान
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