परमाणु ऊर्जा पर जन-सुनवाई, 22 अगस्त, 2012,नई दिल्ली

भारत की सरकार बिलकुल अलोकतांत्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा का एक घातक विस्तार हम पर थोप रही है. इसके लिए लोगों के स्वास्थय तथा आजीविका पर इन परियोजनाओं के प्रभाव, भारत की वास्तविक ऊर्जा-जरूरतों, परमाणु ऊर्जा की सामाजिक तथा पर्यावरणीय कीमतों और फुकुशिमा के बाद दुनिया भर में परमाणु-ऊर्जा पर निर्भरता कम करने के चलन को भी अनदेखा किया जा रहा है.

हाल के वर्षों में, पूरे देश भर में परमाणु बिजली-घर तथा इससे जुड़े संयंत्रों के खिलाफ स्थानीय जनता का विरोध सामने आया है. कूडनकुलम में हज़ारों लोगों की भागीदारी वाला जुझारू आंदोलन अपना एक साल पूरा करने वाला है. हरियाणा के गोरखपुर में स्थानीय किसान पिछले दो साल से रोज प्रस्तावित अणु-बिजलीघर के विरोध में धरने पर बैठ रहे हैं. वे खास तौर पर पिछले महीने हुई उस फर्जी पर्यावरणीय जन-सुनवाई से नाराज़ हैं, जिसमें उनको पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन की रिपोर्ट तक नहीं दी गयी थी.

महाराष्ट्र के जैतापुर में भी एक मजबूत संघर्ष चल रहा है, जहां दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु बिजलीघर लगाने की कोशिश हो रही है. ऐसे ही आंदोलन देश के अन्य कई हिस्सों में चल रहे हैं.

सरकार ने ‘भटका हुआ’, ‘बाहरी लोगों का भडकाया हुआ’ और विदेशी हाथों से संचालित होने के झूठे आरोप लगाकर इन आन्दोलनों को बदनाम किया है और कार्यकर्ताओं के खिलाफ सैकड़ों मुकदमे थोप दी हैं. फुकुशिमा के बाद परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगों की चिंताओं को जानबूझ कर नजरअंदाज़ किया जा रहा है और इन बिजलीघरों की सुरक्षा तथा पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़े दस्तावेज और जानकारी तक छुपाई जा रही है.

इन आन्दोलनों पर हुए दमन में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ है. जैसे कूडनकुलम में लगभग 7,000 ऐसे लोगों पर देशद्रोह तथा भारत-सरकार के खिलाफ युद्ध छेडने के आरोप लगाए गए हैं जो पूर्णतया शांतिप्रिय आंदोलन चला रहे हैं. लोकतांत्रिक कायदों का ऐसा ही सरेआम उल्लंघन दूसरी जगहों पर भी हो रहा है – जैतापुर, मध्य प्रदेश के चुटका, आन्ध्र प्रदेश के कोवाडा, राजस्थान के रावतभाटा इत्यादि में. रावतभाटा परमाणु संयत्र में हाल में हुए ट्रीशियम के रिसाव में 38 मजदूरों के शिकार होने की घटना से वर्त्तमान में चल रहे संयंत्रों की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.

22 अगस्त को दिल्ली में भारत में परमाणु ऊर्जा पर जाना-सुनवाई का आयोजन किया गया है जिसमें इन सभी जगहों के लोग अपने अनुभव साझा करने तथा मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा होंगे. स्वतंत्र वैज्ञानिक तथा विशेषज्ञ भी जजों के एक पैनल के सामने अपने तर्क रखेंगे, जिसमें कुछ सम्मानित नागरिक शामिल होंगे. इन प्रमुख व्यक्तियों द्वारा अंत में इस समस्या पर सुनवाई की जायेगी.

आपसे अनुरोध है कि बड़ी संख्या में इस जन-सुनवाई में शामिल हों और इसे सफल बनाएँ. 
  
परमाणु ऊर्जा पर जन-सुनवाई, 22 अगस्त, 2012
गांधी शांति प्रतिष्ठान,
221-223,दीनदयाल उपाध्याय मार्ग,
नई दिल्ली- 110002

सप्रेम,

कुमार सुन्दरम (परमाणु निरस्त्रीकरण एवं शान्ति गठबंधन)
भार्गवी (दिल्ली फोरम)










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