विदेशी बाजे के शौक़ीन हमारे हुक़्मरान

डा. राजेंद्र प्रियदर्शी लखनऊ में रहते हैं और जाने-माने परमाणु भौतिकविद हैं। उन्होंने 1955 से 1960 तक स्टाकहोम स्थित स्वीडेन के एटामिक एनर्जी स्टेब्लिशमेंट में शोध कार्य किया जिसे दुनिया के अग्रणी नाभिकीय शोध संस्थानों में गिना जाता है। वैज्ञानिक शोध के सिलसिले में वह जर्मनी और कनाड़ा में भी रहे। इसी दौरान उनका मार्क्सवादी साहित्य से परिचय हुआ और जिसने उनका सर घुमा दिया- कि नाभिकीय भौतिकी पर काम चलता रहेगा लेकिन हिंदुस्तान को इंक़लाब की ज़रूरत है और मेरी ऊर्जा सबसे पहले इसी मोर्चे पर लगनी चाहिए। और बस, वह भारत वापस लौट आये। 1967 के आसपास उन्होंने पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी भी बनायी जिसका कानपुर और लखीमपुर खीरी में ख़ासा बड़ा आधार भी बना। लेकिन कोई चार साल की सक्रियता के बाद कोशिशें ठप्प हो गयीं। आज वह 84 साल के हैं, गंभीर अस्थमा से पीड़ित हैं और उनकी नज़रें भी बहुत कमज़ोर हो चुकी हैं। लेकिन बदलाव का जवान सपना आज भी उनकी आंखों में मचलता है। कहते हैं कि आज नहीं तो कल, बदलाव तय है और उसका रास्ता केवल हथियारबंद इंक़लाब है। 


पिछले 40 सालों से डा. राजेंद्र बौद्ध दर्शन के भी क़रीब रहे हैं। बताते हैं कि भौतिक शास्त्र में हाइजनबर्ग और बोर बड़ा नाम हैं। उनका काम क्वांटम सिद्धांत की कोपेनहेगन व्याख्या नाम से जाना जाता है। यह व्याख्या जापान के बौद्ध दर्शन की ज़ेन धारा से प्रभावित है। वैसे भी बहुत से वैज्ञानिक सूत्र महायान (बौद्ध दर्शन का अंग) में मिलते हैं और प्रायोगिक भौतिकी में साफ़ नज़र आते हैं। मसलन, एक में अनेक और अनेक में एक की अवधारणा में ही ब्रह्मांड का रहस्य है। वह मार्क्सवाद, लेनिनवाद और माओवाद को बौद्ध दर्शन का अग्रणी रूप मानते हैं। बहरहाल, परमाणु ऊर्जा और उसके विकल्पों की रोशनी में पेश है उनकी राय;

सबसे अच्छा तो यह होगा कि सौर ऊर्ज़ा का अधिकतम इस्तेमाल किया जाये और इसके लिए अनुसंधानों पर ज़ोर दिया जाये। आख़िर सूरज तो ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है और मुफ़्त में उपलब्ध है।

इसे समझने की ज़रूरत है कि दुनिया में कोई चीज़ कभी पूरी तरह फ़ूलप्रूफ़ नहीं हुआ करती। किसी गड़बड़ी की संभावनाओं को ज़रूर कम से कम किया जा सकता है। केवल संभावनाओं के आधार पर किसी परियोजना को नकार देना एकदम ठीक नहीं। देखना होगा कि उसका विरोध क्यों है? कहीं विरोध का कारण अधूरी या ग़ैर जानकारी तो नहीं, कि कहीं कोई अफ़वाह तो नहीं। अगर ऐसा है तो यह सरकार की ज़िम्मेदारी है कि लोगों का वहम दूर किया जाये, उन्हें विश्वास में लिया जाये। लेकिन अगर किसी परियोजना से भारी नुक़सान होने की संभावनाएं मौजूद हैं तो उसे ज़रूर रद्द होना चाहिए। अगर लोग तैयार नहीं तो उन पर किसी परियोजना को थोपना निरंकुशता है, लोकतंत्र नहीं।

दुर्भाग्य से हिंदुस्तान में यही चल रहा है। एटामिक लायबिलिटी बिल क्या है? इसे मैंने पढ़ा नहीं लेकिन मिली जानकारी के आधार पर केवल यही कहा जा सकता है कि यह नाभिकीय साज़ो-सामान बेचनेवाले देशों के हित में है ताकि किसी हादसे की सूरत में उनके बच निकलने का दरवाज़ा खुला रहे। देश और देश की जनता उसे भुगते, उसका मुआवज़ा भरे। अजब तमाशा है कि सप्लायर को नहीं, आपरेटर को ज़िम्मेदार बना दिया गया। इसका मतलब कि बेचनेवाले को और ख़रीदनेवाले को भी माल की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं। यह सब कुछ इसलिए है कि हमारा देश आज़ाद नहीं है। जो आज़ादी मिली है, वह देश को ग़ुलाम बनाये रखने की आज़ादी है। सच्ची आज़ादी तब मिलेगी जब लोगों की सुनी जायेगी।

तमाम इलाक़ों में हज़ारों-हज़ार डेयरियां हैं और जंगल हैं। गोबर और जैविक पदार्थ इफ़रात में हैं। पूरे देश में इसकी कोई कमी नहीं। इस संसाधन का उपयोग अगर पूरी क्षमता से किया जाये तो हम तेल और गैस के मामले में पूरे अरब को पछाड़ सकते हैं। हाइड्रोज़न के बाद मिथेन सबसे उम्दा ईंधन है। एक लीटर पेट्रोल और आधे लीटर से भी कम मिथेन की उपयोगिता बराबर होती है। इसे गोबर और बायो गैस से निकाला जा सकता है। इस प्रक्रिया में कार्बन डाईआक्साइड और नाइट्रोजन वगैरह भी मिलेगा। क़ायदे से इस दिशा में पहल होनी चाहिए लेकिन हमारे हुक़्मरान तो विदेशी बाजा बजाने के शौक़ीन हैं। उन्हें अपने संसाधनों की इज़्ज़त करना नहीं आता।
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