गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना से जे.पी. कंपनी ने हाथ खींचे


उ. प्र. विधानसभा चुनाव 2012 की अधिघोषणा जारी होने के बाद चुनाव होने से पहले गंगा एक्सप्रेस-वे की विकासकर्ता कम्पनी जे.पी. गंगा इन्फ्रास्टक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड ने परियोजना के लिए पर्यावरण मंजूरी नहीं मिलने तथा मायावती सरकार की संभावित हार के भय से उ.प्र. की मायावती सरकार से गंगा एक्सप्रेस-वे के लिए जमा की गयी अपनी जमानत राशि वापस ले ली, जिससे एक संभावना बनी थी कि अगर उ.प्र. में नयी सरकार (बसपा के अलावा) बनी तो गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना पर रोक लग सकती है, क्योंकि उ.प्र. में सपा, कांग्रेस व भाजपा गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना का विरोध कर रही थीं। यह भी सच है कि उनका विरोध केवल अखबारों में बयानबाजी करने तक ही सीमित था फिर भी सपा के नेता कभी-कभी अपनी जन सभाओं में जनता से यह वादा करते थे कि उनकी सरकार बनने पर गंगा एक्सप्रेस-वे को बनने नहीं दिया जायेगा। उ.प्र. विधानसभा चुनाव 2012 में मायावती की पार्टी बसपा की जबर्दस्त हार हुई और सपा पूर्ण बहुमत से चुनाव जीती अखिलेश यादव उ.प्र. के नये मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनने के बाद 31 मार्च 2012 को अमर उजाला समाचार पत्र में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का एक बयान छपा कि गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना निर्माण में पर्यावरण मंजूरी में जो बाधा है वह जल्दी से दूर की जाय जिससे गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना को फिर से शुरू किया जा सके। इसका जिम्मा यूपीएसटी को दिया है। उसके बाद माननीय मुख्यमंत्री जी का एक बयान अखबारों में फिर आया कि हम गंगा एक्सप्रेस-वे के विरोधी नहीं हैं। आगरा से लखनऊ तक 8 लेन की एक्सप्रेस-वे परियोजना के लिए मंजूरी दे दी और वही मायावती का पुराना राग अलापना शुरू किया कि एक्सप्रेस-वे विकास के लिए जरूरी है इससे समय की बचत होगी।


उपरोक्त घटना से यह बात साफ जाहिर हो गयी कि जब यह पूंजीपति परस्त पार्टियां सत्ता से बाहर रहती हैं तो जनता की सबसे हमदर्द पार्टी बन जाती है और जनता की बोली बोलती हैं और जैसे ही सत्ता में पहुंचती हैं उनकी भाषा और कार्यप्रणाली सब उल्टी हो जाती हैं। जब सपा सत्ता से बाहर थी तब गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना किसान-मजदूर विरोधी थी लेकिन जैसे ही वह सत्ता में आयी तो गंगा एक्सप्रेस-वे विकास के लिए जरूरी हो गया है। इससे साफ जाहिर होता है कि सत्ता में जाते ही सब पार्टियां केवल पूंजीपतियों के हित साधन में लग जाती हैं और सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं।
गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना से प्रभावित किसानों मजदूरों को सपा के सत्ता में आने के बाद एक उम्मीद बंधी थी कि सपा इस परियोजना की विरोधी है। इसलिए इस परियोजना निर्माण पर रोक लगा देगी। इसी उम्मीद से सपा को वोट भी किया था। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के तुरन्त बाद गंगा एक्सप्रेस-वे को बनाने के लिए अपनी सहमति दे कर इस परियोजना से प्रभावित लोगों की उम्मीदों पर वज्राघात कर दिया। अब प्रभावित लोगों के मन में यह बात बैठ रही है कि वास्तव में इस संघर्ष में कोई भी पार्टी किसानों-मजदूरों की मदद नहीं करेगी। यह पार्टियां तब तक ही विरोध करेंगी (वह भी मौखिक या अखबारों में बयानबाजी तक) जब तक सत्ता से बाहर रहेंगी। सत्ता में पहुंचने पर सब पार्टियों का रवैया एक जैसा किसान मजदूर विरोधी हो जाता है।

उ.प्र. विधानसभा चुनाव 2012 की अधिघोषणा होने के बाद से गंगा एक्सप्रेस-वे विरोधी संघर्ष जो थोड़ा ढ़ीला पड़ गया था अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बयान के बाद फिर जोर पकड़ने लगा है। लोगों को यह विश्वास हो गया है कि गंगा एक्सप्रेस-वे में एक इन्च भी जमीन नहीं देने की लड़ाई अब केवल अपने बल पर ही जीती जा सकती है। गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना के खिलाफ जो भी संगठन संघर्ष कर रहे हैं वे एक-दूसरे के साथ संपर्क करके पहले से ज्यादा मजबूती से एकजुट हो रहे हैं। - अरुण सिंह, कृषि भूमि मोर्चा, उत्तर प्रदेश
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