कूडनकुलम: परमाणु संयंत्र विरोधी आंदोलन


11 मई 2012 को कूडनकुलम में चल रहे क्रमिक अनशन के तीन सौ दिन पूरे हो गए. अपनी ताजा घोषणा में भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम (एन.पी.सी.आई.एल.) ने यह कहा है कि अगले दो हफ्तों में कूडनकुलम बिजलीघर में यूरेनियम ईंधन डालने का काम पूरा हो जाएगा और रिएक्टर जल्दी ही चालू कर दिया जाएगा। कूडनकुलम रिएक्टर का निर्माण कार्य पिछले साल अगस्त के बाद स्थानीय आंदोलन के  दबाव में बंद पड़ा था, जिसे पुनः शुरू करने का फैसला तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता ने 19 मार्च को किया। इस फैसले के तुरत बाद कूडनकुलम आंदोलन का केंद्र बने इन्दितराई गाँव को, जहां आस-पास के गावों से पांच हजार के लगभग ग्रामीण और कार्यकर्ता जुटे है।, छह हजार से ज्यादा पुलिस-बल से घेर लिया गया और पूरे इलाके में धारा 144 जारी कर डी गई है। कूडनकुलम आंदोलन में 55000 से ज्यादा लोगों पर देशद्रोह और भारतीय राज्य के खिलाफ युद्ध सरीखे मामले चल रहे हैं, जबकि यह आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा है। इस आंदोलन ने परमाणु ऊर्जा के व्यापक खतरों, कूडनकुलम परियोजना में सुरक्षा और पारदर्शिता की अनदेखी तथा स्थानीय लोगों की आजीविका और पर्यावरण पर पडने वाले प्रभावों को मुद्दा बनाया है।


खुद केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा यह निर्देश जारी किए जाने के बावजूद कि एन.पी.सी.आई.एल. कूडनकुलम परियोजना से जुड़े सुरक्षा-दस्तावेजों को सार्वजनिक करे, इसे अब तक आमजन के सामने नहीं रखा गया है।

मई महीने में एक तारीख से 14 दिन तक लगातार चले भूख-हड़ताल का सरकार पर कोई असर नहीं होने के बाद कूडनकुलम के लगभग चौबीस हजार लोगों ने विरोध-स्वरूप अपने मतदाता पहचान-पत्र स्थानीय अधिकारियों को वापस कर दिए. इस भूख-हड़ताल में चार सौ महिलाओं ने हिस्सा लिया था और ज्यादातर की सेहत 10वें दिन के बाद से बिगड़ती चली जा रही थी। 14 मई को चेन्नई में मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.पी. शाह की अध्यक्षता में हुई स्वतंत्र जनसुनवाई के बाद और देशभर से नागरिकों के अनुरोध के बाद यह भूख-हड़ताल खत्म हुई। इस घटना के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नागरिक और कार्यकर्ता समूहों ने कूडनकुलम आंदोलन के पक्ष में एक अपील पर हस्ताक्षर अभियान चलाया जिसे मुंबई में श्री बिनायक सेन और आनंद पटवर्द्धन तथा दिल्ली में प्रख्यात पर्यावरणविद वन्दना शिवा द्वारा 20 मई को जारी किया गया। इस अपील में नारायण देसाई, प्रशांत भूषण, वन्दना शिवा, प्रफुल्ल बिदवई, ललिता रामदास, बिनायक सेन, पार्थ चटर्जी, आनंद पटवर्धन, ज्ञानी शंकरन, अचिन वनायक,    सुरेन्द्र गाडेकर, सुनील, हिमांशु कुमार, शबनम हाशमी और संदीप पाण्डेय समेत सैकड़ों प्रतिष्ठित भारतीय नागरिकों ने देश की आमजनता से सीधे यह अनुरोध किया कि परमाणु-ऊर्जा के व्यापक विस्तार  के जिस रास्ते पर सरकार देश को ले जा रही है, इससे पहले हमारे समाज में एक साफ और निष्पक्ष बहस जरूरी है.. अपील में यह मांग की गयी कि कूडनकुलम परियोजना को तत्काल रोका जाय, कार्यकर्ताओं पर हो रहे दमन का अंत हो और परमाणु ऊर्जा पर देश-व्यापी खुली बहस के बाद ही इस दिशा में कदम आगे बढाए जाएँ।

कूडनकुलम के प्रमुख कार्यकर्ता डॉ.एस.पी. उदयकुमार ने अपने हालिया सन्देश में लिखा है - ‘‘जब नक्सली सरकारी अधिकारियों और विदेशी पर्यटकों का बलपूर्वक अपहरण कर लेते हैं तो यही सरकार पूरे तामझाम के साथ उनसे बातचीत करने जाती है लेकिन हजारों की तादाद में अहिंसक संघर्ष कर रहे लोगों की तरफ अधिकारी, नेता, वैज्ञानिक और मीडिया कोई भी ध्यान नहीं देता’’ कूडनकुलम जैसे संघर्ष आज हमारे लोकतंत्र के सामने उपस्थित उस बड़े खतरे के सूचक हैं, जिसमें हमारी पूरी व्यवस्था कुछ निहित स्वार्थों और विकास की अंधी दौड़ के हाथों गिरवी हैं. कूडनकुलम के आमलोगों ने सरकार की तरफ से बातचीत की भी कोई पेशकश नहीं होने पर हाल में यह निर्णय लिया है कि वे अपने सरकारी मतदाता पहचान पत्र अपने निकटवर्ती   तहसीलदार को वापस कर देंगे। उन्होंने कहा है ‘‘जब मुख्यधारा के राजनेता और उनकी पार्टियां हमारे जीवन, और लोगों के हितों की रक्षा नहीं कर सकते, हमने तय किया है की हम उनके लिए वोट नहीं करेंगे।’’

कूडनकुलम के रिएक्टर-परियोजना में कई सारे नियमों, मानकों, प्रक्रियाओं और सवालों का अस्वीकार्य उल्लंघन किया गया है. बरसों से शांतिप्रिय तरीके से आंदोलनरत स्थानीय जन-समुदाय ने कूडनकुलम परियोजना और परमाणु-ऊर्जा से जुड़े व्यापक खतरों पर आधारित कई जरूरी सवाल उठाए हैं. कई सारे स्वतंत्र वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने भी कूडनकुलम रिएक्टर शुरू करने के भारी खतरों के प्रति देश को आगाह किया है। - सुन्दरम
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