कांके-नगड़ी में भूमि अधिग्रहण के विरोध में स्थानीय आदिवासियों का संघर्ष


कांके-नगड़ी में सरकार जमीन अधिग्रहण कानून 1894 के तहत 1957-58 में राजेंन्द्र कृर्षि विश्वविद्यालय के विस्तार के लिए 227 एकड़ जमीन अधिग्रहण का विरोध राईयतों द्वारा 1957-58 से लेकर आज तक जारी हैं। वर्तमान सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण का नोटिफिकेशन के साथ ही राईयतों ने विरोध करना शुरू किया। ग्रामीणों के विरोध के कारण ही सरकार जमीन का अधिग्रहण नहीं कर पायी।


कांके नगड़ी में आई आई एम और लॉ कॉलेज के नाम पर सरकार द्वारा पुलिस के बल पर जबरदस्ती जमीन अधिग्रहण के खिलाफ ग्रामीण 4 मार्च 2012 से अपने खेत की सुरक्षा के लिए अपने खेत में सत्यग्रह आंदोलन में उतरे। अप्रैल, मई के इस चिलचिलाती धूप में भी नगड़ी के ग्रामीण सत्यग्रह स्थल पर डटे हुए हैं। 4 मार्च 2012 को जब ग्रामीण खेत पर सत्यग्रह के लिए उतरे-227 एकड़ खेत को सीमा बांधते हुए चारों ओर बंदुकों से लैस पुलिस फोर्स ग्रामीणों को घेरे हुऐ था। 9 जनवरी से वहां चहरदिवारी निर्माण कार्य चालू कर रखा था। 6 मार्च से काम बंद कर दिया गया, पुलिस हटा दिया गया। ग्रामीण लगातार सत्यग्रह आंदोलन स्थल में जमे रहे। बार एसोसियेशन ने हाई कोर्ट में अपील किया कि-लॉ कालेज में पढ़ने वाले विद्यार्थीयों के लिए क्लास की कमी हो रही है इसलिए यथाशीघ्र निर्माण कार्य पुरा किया जाए, इसके बाद 30 अप्रैल 12 को हाई कोर्ट को आदेश आया- आई आई एम और लॉ कॉलेज का निर्माण कार्य रोक दिया गया है-उसे यथाशीघ्र प्रारंम्भ किया जाए। इस आदेश के बाद 2 मई 2012 को पुनः 500 सशस्त्र पुलिस बल उतारा गया। 5 मजिस्ट्रेट बहाल किया गया। 5 थाना को दिन रात वहां तैनात किया गया। और निर्माण कार्य चालू किया गया। सैकड़ों पुलिस बल के साथ एसडीओ शेखर जमुअर  सत्यग्रह स्थल पहुंचा, बोला आप लोग यहां से हट जाइये, निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा। ग्रामीणों ने कहा-हमारी जमीन है-हम यहां से नहीं हटेगें, शेखरजी बोेले-आप लोगों को बता दे रहे हैं-कि जो विरोध करेगा-उस पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ग्रामीणों ने कहा-सर आप गोली चला दीजीए-हम यहीं मरना चाहते हैं, लेकिन यहां से नहीं हटेंगें।

9 जून 2012 को नगड़ी सहित प्रस्तावित नयी रांची के खिलाफ -विस्थापन रोकने के लिए राज भवन घेराव का आयोजन किया गया। करीब 7 हजार ग्रामीणों ने नगड़ी से राजभवन घेराव के लिए मार्च किया। नगड़ी से राज भवन करीब 15 किलोमीटर है। सरकार ने राज भवन को सुरक्षा देने के लिए सभी मार्गों को सुरक्षा घेरा बनाकर -बेरिकेटिंग कर रखी थी। चिलचिलाती धूप में लंबा रास्ता तय कर जब रैली रांची में पहुंची तो राज भवन के सभी मार्गों में लोगों को रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनाती थी- इससे नाराज ग्रामीणों ने चांदनी चौक के पास सुरक्षा घेरा तोड़ते हुए राज भवन तक पहुंचे। पुलिस ने दूर में ही रैली रोक दी। इसके बाद वहीं सभा का आयोजन किया गया।

सभा के बाद 10 सदस्यों की टीम महामहिम से मिलने के लिए राज भवन गयी। राज्यपाल डा़ अहमदजी को टीम के सदस्यों ने क्षेत्र में हो रहे राजकीय दमन, पांचवी अनूसूची का घोर उल्लंघन, सीएनटी एक्ट के हो रहे उल्लंघन के बारे में बताया। 9 जून 2012 के रैली में सुरक्षा घेरा तोड़ने के मामले में माले के विधायक श्री बिनोद सिंह, मासस के विधायक श्री अरूप चटर्जी, विधायक श्री बंधु तिर्की जी, दयामनी बरला, नंदी कच्छप, किशोर कुमार महतो, राजेंन्द्र महतो सहित हजार लोगों पर केस किया गया। 10 जून 2012 को कांके थाना ने नगड़ी के ग्रामीणों पर आरोप लगाया कि-करीब 60 की संख्या में हरवे-हथियार से लैस लोगों ने निर्माण कार्य कर रहे मजदूरों के साथ मार पीट की, साथ ही कई गाड़ियों को जला दिया। इस आरोप पर 100 लोगों पर केस किया गया। जब कि ये आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है-सरकार इस आंदोलन को कमजोर करने की साजिश के तहत यह आरोप ग्रामीणों पर मढ़ रही है। ग्रामीणों के इस सत्याग्रह आंदोलन को 105 दिन पूरे हो चुके हैं। मामला सुप्रीम कोर्ट में है। - दयामनि बरला

सेवा,
आयुक्त                                                              
दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल
रांची-झारखंड                                                             
झारखंड
विषय- कांके नगड़ी के ग्राम सभा से बिना सहमति लिये ही, किसानों की कृषि भूमि, जो इनका एक मात्र जीविका का साधन है-को सरकार आई आई एम और लॉ कॉलेज के नाम पर जबरन पुलिस बल के द्वारा जमीन कब्जा कर रही है-इसको रोकने के संबंध में।
महाशय,
इतिहास गवाह है कि इस राज्य की धरती को हमारे पूर्वजों ने सांप, भालू, सिंह-बिच्छु से लड़कर आबाद किया है। इसलिए यहां के जंगल, पानी, जमीन पर हमारा पारंपरिक अधिकार है। इस राज्य के जंगल-जमीन की रक्षा के लिए सिद्वू-कान्हू, बिरसा मुंडा जैसे वीर आदिवासी  नायकों ने शहादत दी है। इन शहीदों के खून की कीमत है छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908। इस कानून में आदिवासियों के जमीन की रक्षा का विशेष प्रावधान है। यह कानून कृषि भूमि में किसी तरह के गैर कृषि निर्माण कार्य को भी इजाजत नहीं देता है। लेकिन राज्य सरकार नगड़ी ग्रामवासियों के हाथ से पुलिस के बल पर जमीन छीन कर किसानों-राईयतों को भूमिहीन, गरीब-कंगाल बनाने जा रही है।
महामहिम का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहते हैं-कि राज्य पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है और इस इलाके में पेसा कानून भी अस्तित्व में है। इस कानून के आलोक में कहना चाहते हैं-कि इस इलाके में जो भी विकास योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में लागू की जाएगी-इसकी इजाजत ग्राम सभा से ली जाएगी। लेकिन सरकार आई आई एम और लॉ कॉलेज के नाम पर जमीन ग्रामीण देना चाहते हैं- नहीं, इस संबंध में ग्राम सभा से किसी तरह का राय-विचार -विमर्श नहीं लिया गया। यह पांचवी अनूसूची को दिये अधिकार ’’ग्राम सभा ’’ सहित पेसा कानून का घोर उल्लंघन है। यह हम आदिवासी मूलवासी किसानों के ऊपर राजकीय दमन है।
हम नगड़ी ग्रामवासी आप को यह भी बताना चाहते हैं-कि 57-58 में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के लिए जमीन अधिग्रहण की बात सरकार कहती है-लेकिन तब भी हम ग्रामीण जमीन अधिग्रहण का विरोध किये-हम अपने पूर्वजों का जमीन नहीं देना चाहते हैं, यही कारण है कि-जमीन का पैसा सरकार देना चाही-तब भी हमलोगों ने पैसा नहीं लिया।
हम नगड़ीवासी महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं-कि नगड़ी आदिवासी बहुल गांव है। यहां (57-58) 153 पंचाटियां थीं, (वर्तमान में कई और परिवार बढ़ गये हैं) यहां कुछ परिवार मुस्लिम भी हैं। इन 153 पंचाटियों में से 128 राईतों (पंचाटियों) ने जमीन का पैसा लेने से इन्कार किया, क्योंकि हम किसी भी कीमत में अपना जमीन देना नहीं चाहते हैं। जो मुस्लिम समुदाय के हैं वे पैसा लिये।
हम आप को यह भी कहना चाहते हैं-कि हम आदिवासी समाज का जीविका, अस्तित्व, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पहचान जमीन-जंगल के साथ जुड़ा हुआ है। हम तब तक आदिवासी हैं-जबतक जमीन के साथ जुड़े हुए हैं। और इस पांचवी अनुसूची एवं सीएनटी एक्ट क्षेत्र में हमारे अधिकारों की रक्षा एवं विकसित करने की जिम्मेवारी राज्य के महामहिम राज्यपाल की है।
हम महामहिम को यह भी बताना चाहते हैं कि-57-58 में सरकार द्वारा प्रयास किये गये जमीन अधिग्रहण का विरोध तब भी हम लोगों ने किया और जमीन हमारे पूर्वजों से लेकर आज भी हमारे ही हाथ में है। आज भी हम खेती कर रहे हैं और जमीन का मालगुजारी भी देते आ रहे हैं। लेकिन साजिश के तहत कुछ लोगों का मालगुजारी रसीद 2008 से काटना बंद कर दिया। लेकिन कुछ लोगों का मालगुजारी 2011 तक भुगतान किया गया है।
यहां यह भी स्पष्ट करना चाहते हैं-कि 57-58 में पूर्ववर्ती राज्य सरकार द्वारा राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय वर्तमान में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय कांके के लिए जिस जमीन को मात्र चिन्हित किया गया था-का मालिकाना हक बिरसा   कृषि विश्वविद्यालय कांके को है-सरकार यह मानती है। इसी आधार पर राज्य सरकार उक्त भूमि का अपने विभिन्न योजनाओं में अलग-अलग उद्देश्य में उपयोग करना चाह रही है और इस बाबत बिरसा कृषि विश्वविद्यालय कांके पर उक्त भूमि पर अनापति प्रमाण पत्र जारी करने का दबाव डाला गया। ज्ञातव्य हो कि बिरसा कृषि विश्वविद्यालय और पथ निर्माण विभाग रांची के बीच प्रश्नगत भूमि पर रिंग रोड निर्माण हेतु कई पत्राचार हुए। इसमें जमीन का मलिकाना हक बिरसा कृषि विश्वविद्यालय को नहीं है-क्योंकि जमीन का अधिग्रहण नहीं किया गया है-यह बात स्वंय अधीक्षण अभियंता पथ निर्माण विभाग, पथ अंचल रांची ने पत्रांक 1137 दिनांक 18.08.08 में स्पष्ट किया है।
हम आप को बताना चाहते हैं-कि जिस जमीन को 57-58 में बिरसा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत मानती है-वह बिरसा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा अधिग्रहीत नहीं है। इसकी पुष्टी स्वंय बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने (6375) दिनांक 17-12-2008 में की गयी है।
सरकार ने जमीन अधिग्रहण के नाम पर-कागज पर फरजी अधिग्रहण कर रखा है-और इसी फरजी अधिग्रहण के आधार पर जिला भू-अर्जन विभाग ने आई आई एम हेतु कुल 214.29 एकड़ जमीन राज्यादेश संख्या-658/रा0 दिनांक 07.03.2009 से मानव संसाधन विकास, झारखंड को निःशुल्क हस्तान्तरण कर दिया है। साथ ही 12.635 एकड़ भूमि रिंग रोड निर्माण के लिए पथ निर्माण विभाग को हस्तान्तरण कर दिया गया। 
सरकार हमारे अधिकारों का हनन करते हुए जबरदस्ती 9 जनवरी 2012 को पुलिस बलों के सहयोग से हमारे जमीन पर कब्जा कर लिया और गलत तरीके से घेराबंदी का काम किया जा रहा है। हमारी यह जमीन उपजाऊ कृषि भूमि है। यहां साल में तीन फसल उगाते हैं। धान का फसल काटने के बाद हम लोगों ने वहां चना, गेहूं आदि फसल भी बो दी थीं-जिसको पुलिस वालों ने रौंद डाला।
हम नगड़ीवासी आप से कहना चाहते हैं-हम विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हम आदिवासी किसानों को उजाड़ कर नहीं। हम आई आई एम तथा लॉ कालेज का विरोध नहीं कर रहे हैं-लेकिन हमारे कृषि भूमि में नहीं।
हमारा संकल्प -हम अपने पूर्वजों की एक इंच जमीन भी नहीं देगें, क्योंकि हमारे सामाजिक मूल्यों, भाषा-संस्कृति, सरना-ससनदीरी, मसना, इतिहास और पहचान को किसी भी मुआवजा से नहीं भरा जा सकता है, ना ही उसको पूनर्वासित किया जा सकता है।
हमारे सुझाव-
  1. चिन्हित किया गया जमीन कांके नगड़ी के किसानों की उपजाऊ कृषि भूमि है और यह जीविका का एक मात्र साधन है। इस पर किसी भी तरह का इमारत -बिल्डिंग नहीं बनाना चाहिए
  2. आई आई एम एवं लॉ कॉलेज एक विशिष्ट शिक्षण संस्थान है, इसलिए यह ऐसी जगह पर बनायी जाए जो गांव से 30-35 किलो मीटर दूरी पर हो, ताकि शिक्षण कार्यक्रम में किसी तरह का बाधा नहीं पहुंचे।
  3. आई आई एम एवं लॉ कॉलेज शिक्षण संस्थान शहर -गांव की भीड़ भाड़ से दूर शांत जगह में बनाया जाए।
  4. ऐसी जगह से संस्थान खड़ा किया जाए जो सरकारी जमीन हो, बंजर भूमि और कृषि योग्य नहीं हो, सरकार ऐसी जगह चिन्हित करें।

हमारी मांगें-
  1. ग्राम सभा को दिये गये अधिकारों का सम्मान किया जाए तथा जिस जमीन को जबरन पुलिस बल द्वारा अधिग्रहण किया जा रहा है-उसे यथाशीघ्र रोका जाए।
  2.  छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 के मूलधारा 46 में आदिवासियों को जो अधिकार दिये गये हैं-उसका सम्मान किया जाए।
  3. हम आदिवासी-मूलवासी किसी भी कीमत में हमारी खेती की जमीन को आई आई एम एवं लॉ कॉलेज के लिए नहीं देगें।
  4. आदिवासी-मूलवासियों का विस्थापन रोका जाए।

                                         
आप के विश्वास्त
कांके -नगड़ी के ग्रामीण

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