जारी है भूमि-अधिग्रहण के खिलाफ संघर्षरत किसानों पर बर्बर दमन

उत्तर प्रदेश में भूमि-अधिग्रहण के मुद्दे पर किसानों तथा प्रशासन के टकराव की हिंसक घटनायें राज्य सरकार तथा केन्द्रीय सरकार के बर्बर रूप को दर्शाती हैं। ग्रेटर नोएडा से शुरू हुआ किसान आंदोलन अब उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी फैल चुका है। उत्तर प्रदेश में किसानों पर 2007 से अब तक आठ बार लाठी-गोली चल चुकी है और करीब दर्जन भर किसान मारे जा चुके हैं और उ. प्र. सरकार की कानून प्रियता की यह स्थिति है कि दिसंबर 2009 से जुलाई 2011 के बीच 6 बड़े-बड़े भूमि-अधिग्रहणों को माननीय उच्च न्यायालय ने अवैध बताकर रद्द कर दिया है। ज्यादातर मामलों में यह भूमि अधिग्रहण रीयल इस्टेटकारोबारियों को लाभ पहुंचाने के नापाक इरादे से किये गये थे। इस तथ्य को न्यायालय ने रेखांकित किया है।


ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल गांव में ज्यादा मुआवजे के लिए 111 दिनों से धरने पर बैठे किसानों तथा पुलिस के बीच हुई हिंसक घटना में दो पुलिसकर्मियों सहित चार लोग मारे जा चुके हैं। करीब सौ साल पुराने अंग्रेजों के बनाये भूमि-अधिग्रहण कानून को लेकर किसानों की नाराजगी अब बढ़ती जा रही है। किसानों का तर्क है कि प्रदेश सरकार जमीन के धंधे में क्यों लगी हुई है? किसानो ंसे आठ-नौ सौ रुपये वर्ग मीटर की दर से जमीन लेकर राज्य सरकार व्यापारियों और उद्योगपतियों को बीस हजार रुपये वर्ग मीटर के हिसाब से बेच रही है। और यह व्यापारी आगे चलकर इसे और मोटी दर से बेचकर जबरदस्त मुनाफा कमा रहे हैं। मुनाफे के इस गोरखधंधे में किसान अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

दूसरी तरफ गंगा एक्सप्रेस-वे और यमुना एक्सप्रेस-वे को लेकर पूर्वांचल में भी माहौल गरमाता जा रहा है। दरअसल किसानों से जमीन के अधिग्रहण को लेकर अब नये सिरे से सवाल उठ रहे हैं। एक आकलन के मुताबिक उत्तर प्रदेश में विभिन्न किस्म के एक्सप्रेस-वे और अन्य परियोजनाओं के लिये जो जमीन ली जा रही है उससे करीब 25,000 गांव उजड़ जायेंगे। यह संख्या प्रदेश के समूचे गांवों की एक चौथाई है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसानों के सिर पर कितना बड़ा संकट मंडरा रहा है।

उत्तर प्रदेश में जब से बसपा की सरकार बनी है, राज्य में हुए किसान आंदोलन सुर्खियों में रहे हैं। बसपा सरकार का कोई साल ऐसा नहीं गया है जब किसानों पर लाठियां और गोलियां न चली हों। पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश में किसानों को दबाने के लिए प्रशासन व पुलिस ने जबरदस्त हिंसक तरीके का प्रयोग किया है।

  • मायावती के गांव बादलपुर में 50 बीघा से ज्यादा जमीन मुख्यमंत्री आवास के लिए किसानों को डरा-धमका कर ले ली गयी। किसानों द्वारा विरोध करने पर पुलिस ने उन पर जमकर लाठियां भांजी।
  • धूममानिकपुर और बढ़पुरा के किसान बीते तीन साल से मुआवजा बढ़ाने की मांग को लेकर शांतिपूर्वक तरीके से धरना और प्रदर्शन कर रहे किसानों और महिलाओं को जेल में ठूंस दिया गया। उनके खिलाफ झूठे मुकदमें भी दर्ज किये गये हैं।
  • रानोली, लतीफपुर और सिराहड़ा गांवों में धरने पर बैठे किसानों, महिलाओं को भी जेल में डाल दिया गया। इन गांवों के किसान अंबुजा और बिरला को दी गई जमीन का मुजावजा बढ़ी दर पर देने की मांग कर रहे थे।
  • घोड़ी बछेड़ा गांव में पुलिस ने सात किसानों को मौत के घाट उतार दिया था।
  • साखीपुर और डाढा के किसानों द्वारा ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ मुआवजे की मांग को लेकर आंदोलन शुरू करने पर दोनों गांवों में पीएसी लगा दी गई। किसानों को घर से बाहर तक नहीं निकलने दिया गया।
  • बख्तावरपुर गांव में भी पुलिस और पीएसी ने लोगों को घरों में ही नजरबंद कर दिया और किसानों पर जमकर लाठियां भांजी।
  • गढ़ी-चौखंडी में किसानों के घर पुलिस ने ढहा दिये। किसानों द्वारा विरोध करने पर उन्हें लाठी-डंडे से पीटा गया।
  • बिसरख में भी किसानों पर लाठियां चलाई गईं। किसानों के खिलाफ झूठे मुकदमें दर्ज करवा दिये गये। जिले की महिलायें जब राष्ट्रपति को अपनी मांगों से संबंधित ज्ञापन देने पदयात्रा पर निकलीं तो उन्हें गिरफ्तार करके 14 दिन की हिरासत में भेज दिया गया।
  • 2010 में टप्पल में भी जमीन के मुआवजे को लेकर आंदोलन चला जिसमें पुलिस की गोली से तीन किसान मारे गये। चालीस से ज्यादा किसानों को झूठे मुकदमों में फंसा दिया गया।
  •  इसी साल आगरा और इलाहाबाद में भी किसानों पर गोली चली। इलाहाबाद में एक किसान मारा गया।

यह सब तमाम घटनायें इस बात को दर्शाती हैं कि उ. प्र. सरकार ने पूरे साढ़े चार साल के दौरान किसानों के आंदोलन को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।


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