जनआंदोलनों का दमन: राष्ट्रीय सम्मेलन

इंडियन सोशल एक्शन फोरम (इंसाफ) द्वारा 8 एवं 9 दिसंबर 2010 को राजेन्द्र भवन, नयी दिल्ली में जन आंदोलनों के दमनविषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस प्रतिनिधि सम्मेलन में मणिपुर, प. बंगाल, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, पांडिचेरी एवं दिल्ली राज्यों से विभिन्न जनसंघर्षों के ऐसे प्रतिनिधि शिरकत कर रहे थे जो जन संघर्षों के दरम्यान सीधे तौर पर राज्य एवं कारपोरेट के दमन, उत्पीड़न, हिंसक हमलों तथा गिरफ्तारियों के शिकार हुए हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे जिन पर 132 तथा 44-44 तक मुकदमें कायम हैं। पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति जैसे संघर्ष के प्रतिनिधि शामिल थे जिस संघर्ष पर 72 मुकदमे दर्ज हैं।

इसके अतिरिक्त मानवाधिकार संगठनों पी.यू.सी.एल., पी.यू.डी.आर. तथा सी.पी.डी.आर. (महाराष्ट्र) के प्रतिनिधियों तथा न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर, समाजवादी चिंतक श्री सुरेन्द्र मोहन ने भी सम्मेलन में शिरकत की।

पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति (पोस्को विरोधी आंदोलन-उड़ीसा), नियामगिरि सुरक्षा समिति (वेदांत विरोधी आंदोलन-उड़ीसा), व्यास यूथ ऑर्गनाइज़ेशन एवं टाटा प्रतिरोध संघर्ष समिति (टाटा विरोधी आंदोलन, कलिंगनगर, उड़ीसा), आदिवासी मूलवासी अस्तित्व रक्षा मंच (मित्तल विरोधी आंदोलन-झारखंड), जिंदल-भूषण विरोधी आंदोलन-पोटका, झारखंड, जिंदल विरोधी आंदोलन (तमिलनाडु), सेज विरोधी आंदोलन (आंध्र प्रदेश), नदी घाटी मोर्चा एवं जिंदल विरोधी आंदोलन (छत्तीसगढ़), नागार्जुन पावर प्लांट विरोधी संघर्ष (आंध्र प्रदेश), खनन विरोधी आंदोलन प. गोदावरी (आंध्र प्रदेश), वन वासियों एवं वन श्रमिकों का राष्ट्रीय मंच (उ. प्र.), हाकर्स यूनियन (प. बंगाल), गंगा एक्सप्रेस वे विरोधी आंदोलन (उ. प्र.), विस्थापन विरोधी संघर्ष, काठीकुण्ड (झारखंड), दमन विरोधी मंच (गुजरात), ए.एफ.एस.पी.ए. विरोधी संघर्ष (मणिपुर) आदि संघर्षों के साथियों ने सम्मेलन में भागेदारी निभायी।
सम्मेलन की शुरूआत में पोस्को विरोधी संग्राम के साथी बिक्रम अली (सांग फ्राम कन्धमाल), मित्तल विरोधी आंदोलन के साथी बदर तोपनो, बीकानेर से आये साथी अब्दुल जब्बार तथा गुजरात के साथी अब्दुल शकील (वह सुबह कभी तो आयेगी) ने संघर्षों के गीत प्रस्तुत किये।

सम्मेलन में आये साथियों का स्वागत करते हुए इंसाफ के महासचिव का. चितरंजन सिंह ने सम्मेलन के विषय पर रोशनी डालने के लिए श्री अनिल चौधरी को आमंत्रित किया।
अनिल चौधरी ने सहभागियों का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए कहा कि-
  • आज पूरे देश में जनसंघर्षों का बेरहमी से दमन किया जा रहा है।
  • आज जनतांत्रिक आंदोलनों के लिए स्थान-अवसर तेज़ी के साथ सिमटे हैं।
  • नव उदारवाद (आधुनिक पूंजीवाद) तथा लोकतंत्र परस्पर विरोधी हैं, या तो नव उदारवाद रहेगा या लोकतंत्र।
  • नव उदारवाद ने शुरूआती दौर में तानाशाही का इस्तेमाल करते हुए अपने चहेतों को सत्तासीन किया। इसके बाद दूसरे चरण में अपने दलालों को उसने सत्ता तथा सत्ता के प्रमुख पदों पर पदारूढ़ कराया और आज अपने तीसरे चरण में नव उदारवाद आतंकवाद-उग्रवाद को औज़ार बनाकर लोकतांत्रिक आंदोलनों को कुचल रहा है।
  • हमारे देश में नव उदारवाद के यह तीनों चरण एक साथ काम कर रहे हैं। देश के दो महत्वपूर्ण पदों प्रधानमंत्री एवं योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद पर नव उदारवाद के झण्डाबरदार स्थापित कर दिये गये हैं। धार्मिक कट्टरता (हिन्दु, मुस्लिम सांप्रदायिकता) तथा वैचारिक कट्टरता (माओवाद) का इस्तेमाल शासक वर्ग लोकतांत्रिक आंदोलनों को कुचलने के लिए कर रहा है।
इसके बाद अनिल चौधरी ने सम्मेलन के विषय पर खुली चर्चा के लिए साथियों से आग्रह करते हुए अपनी बात समाप्त की।

इस सत्र में का. अभय साहू, कुमार चन्द मार्डी, पीयूष, कुमटी माझी, रामाश्रय यादव, न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर, राजेन्द्र, कैलाश मीना, अब्दुल शकील, डा. सुनीलम, रवि किरन जैन, सुरेन्द्र मोहन आदि वक्ताओं ने अपने तथा जनसंघर्षों के ऊपर हो रहे दमन तथा उत्पीड़न को बताते हुए अपने विचार रखे। चर्चा में कुछ बातें मुख्य तौर पर उभर कर सामने आयीं -
  • दमन और संघर्ष परस्पर जुड़े हुए हैं।
  • दमन की शुरूआत कंपनियों की तरफ से की जाती है तथा दमन का दूसरा चरण सरकार द्वारा कंपनियों के साथ मिलकर किया जाता है।
  • अभी सरकार ने आंदोलनकारियों के साथ सीधे टकराव का रास्ता अपना रखा है।
  • आदिवासी क्षेत्रों में कायम परंपरागत पंचायतों तथा सामूहिकता को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया जा रहा है।
  • राज्य उत्पीड़न के साथ ही साथ मीडिया उत्पीड़न की भी चुनौती है।
  • दमनकारी कानूनों का सृजन करके उसका इस्तेमाल जन आंदोलनों के दमन के लिए किया जा रहा है।
  • पूरी की पूरी व्यवस्था तथा उसके सभी अंग जन विरोधी हैं तथा राज्य ने अपने ही देशवासियों के खि़लाफ जंग का ऐलान कर रखा है।
  • अन लॉ फुल एक्ट्स तथा देश द्रोह के मुकदमे कायम करके या संदिग्ध माओवादी बताकर लोगों को महीनों जेल में निरूद्ध रखा जा रहा है।
  • गरीबों को और ज़्यादा से ज़्यादा लूटने के जुगत वैश्विक पैमाने पर बैठाये जा रहे हैं हम वैश्विक पूंजीवादके शिकार हैं।
दूसरे सत्र में चर्चा जारी रखते हुए गौतम बन्दोपाध्याय, जयंत बहिदार, आलोक मोहंती, राजा राव, अमृत बघेला, कुमार स्वामी,अमर नाथ यादव आदि वक्ताओं न अपनी बातें रखते हुए न्यायापालिका की भूमिका पर भी सवाल  उठाये इसके अलावा इस सत्र में जो मुख्य बातें रखी गयीं वे थीं-
  • आंदोलन के सभी तरीके आंदोलनकारियों द्वारा अपनाये जाते रहे हैं वहीं दूसरी तरफ राज्य एवं कंपनियों द्वारा दमन के सारे तरीके अपनाये जा रहे हैं। दोनों तरफ से नये तरीकों की खोज जारी है।
  • जन सुनवाइयां नाटक हैं। आज तक पर्यावरण के आधार पर किसी भी परियोजना को निरस्त नहीं किया गया है कुछ समय के लिए स्थगित भले कर दिया गया हो।
  • आंदोलनों से सरकारें डरीं हैं, आंदोलन चाहे सत्ताधीशों को चुनाव जीतने से न रोक पाये हों परंतु सरकारों की  लोकलुभावन छवि को तहस नहस जरूर किया है।
  • गुजरात जैसे प्रांत में वहां की सरकार माओवाद-आतंकवाद-संस्कृतिकर्म तथा स्वंयसेवी संगठनों में अंतःसंबंध भी तलाश रही है, स्थापित कर रही है।
  • सेज की तर्ज पर गुजरात में स्पेशल इनवेस्टमेंट रीजन की स्थापना की योजना है, इसकी स्थापना के लिए  प्रत्येक रीजन हेतु 10,000 एकड़ ज़मीन की ज़रूरत होगी। किसान भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे हैं परंतु  सरकार मीडिया के जरिये अपने आपको विकास का सर्वोत्तम माडल बताने में लगी हुई है। भूमि अधिग्रहण  विरोधी आंदोलन के समर्थक सत्ताधारीदल के एक विधायक तक पर जानलेवा हमला किया गया। अतएव तथाकथित देशभक्ति, विकास, कारपोरेट तथा मीडिया के पारस्परिक गठजोड़ को भी समझना होगा।
सम्मेलन की दूसरे दिन की कार्यवाही का प्रथम सत्र मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा मुख्य तौर पर संबोधित किया गया। इस सत्र को चितरंजन सिंह, गौतम नवलखा (पी.यू.डी.आर.), आनंद (सी.पी.डी.आर.) जैसे वक्ताओं ने संबोधित किया तथा दूसरे सत्र को दयामति बारला, अशोक चौधरी, सज्जन कुमार, निज़ाम अंसारी तथा बबलू आदि ने संबोधित किया। यह दोनों सत्र जनसंघर्षों के सामने मौजूद चुनौतियों, इनके कारणों तथा इनसे निपटने की रणनीति पर केन्द्रित था। इन दोनों सत्रों में जो बातें उभरकर सामने आयीं वे थीं -
  • विस्थापन, पलायन, भूमि अधिग्रहण जैसे मसलों पर हम सभी लोग कार्यकर रहे हैं परंतु कोशिशें तितर बितर हैं। कारण हो सकते हैं राजसत्ता के चरित्र के विश्लेषण में फर्क, वैचारिक मतभेद, सुधारवादी बनाम परिवर्तनवादी नज़रिया,   हिंसक बनाम अहिंसक रास्ता परंतु मूल में इसका कारण वैचारिक संकीर्णता है। अतएव वैचारिक संकीर्णता से  बाहर आना होगा।
  • प्रतिरोधों में खेमेबंदी बंद करनी होगी। हमें संकीर्णता तथा मतभेदों को चिन्हित करना होगा तथा काम करने  (संघर्ष) के तरीकों के मतभेद के बावजूद भी हमें एकजुटता की तरफ बढ़ना होगा।
  • जनसंघर्षों को राजनैतिक हस्तक्षेपों की तरफ बढ़ना होगा।
  • नयी पीढ़ी को संघर्षों के साथ जोड़ा जाय।
  • प्रतिरोध की प्रक्रिया की जटिलताओं को बारीकी से विश्लेषित किया जाय।
  • दमन की राजनीति के खिलाफ नये समाज व नयी व्यवस्था का निर्माण मूल सवाल है।
  • जनसंघर्षों का नेतृत्व ज़्यादा से ज़्यादा जनकेन्द्रित हो तथा सत्ता केन्द्रित न हो।
कुछ वक्ताओं की राय थी कि विधान सभाओं तथा लोक सभा में हमारी मज़बूत भागेदारी हो परंतु कुछ की राय थी कि संसदीय लोकतंत्र भटकाव का रास्ता है।
फौरी तौर पर अमल हेतु दो प्रमुख प्रस्ताव आये-
  • विभिन्न जनसंघर्षों के बीच में राष्ट्रीय स्तर का जीवंत समन्वय तथा सूचना के आदान-प्रदान के तंत्र को विकसित किया जाय। यह समन्वय मुद्दा, क्षेत्र तथा वैचारिक खेमेबंदी से परे हो।
  • विकास के इस जन विरोधी माडल के विरोध में पूरे देश में प्रत्येक वर्ष एक निश्चित दिन पर कार्यक्रम करके  इसको चुनौती दी जाय।
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