सम्मेलन - उदास मौसम के खि़लाफ

29 नवंबर 2010, रवींद्रालय, लखनऊ

30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ द्वारा बाबरी मस्जिद और उसके परिसर की ज़मीन की मिल्कियत को लेकर दिए गए फैसले ने भारतीय संवैधानिक ढाँचे की बुनियाद को लेकर कई गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं, प्रश्न मस्जिद के परिसर की मिल्कियत से अधिक अब इस बात का है कि क्या न्यायालय धार्मिक आस्थाओं की ऐतिहासिकता की जांच करने का काम अपने दायरे के भीतर मानने लगे हैं। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जिस तरह मस्जिद में सेंध लगा कर मूर्तियाँ रखने वालों को वैध दावेदार का दर्जा इलाहाबाद न्यायालय ने इस फैसले के ज़रिये दिया है, उससे इस तरह की हरकतों के लिए रास्ता खुलने का खतरा है।


इन गंभीर सवालों पर विचार-विमर्श करने तथा देश की धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए अनहदएवं इंसाफने 29 नवंबर 2010 को लखनऊ स्थित रवीन्द्रालय में एक दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया। इस मौके पर पोस्टर प्रदर्शनी तथा सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन किया गया। सम्मेलन में सामाजिक कार्यकर्ताओं, बृद्धिजीवियों, साहित्यकारों, कलाकर्मियों, इतिहासविदों, अधिवक्ताओं तथा पत्रकारों ने शिरकत  की। उ. प्र. के विभिन्न जिलों के साथ ही साथ दिल्ली, चण्डीगढ़ जैसे स्थानों से भी लोगों ने भागेदारी की।

सम्मेलन की शुरूआत में आदियोग, अलका प्रभाकर जैसे साथियों ने अमन के गीत प्रस्तुत किये। प्रो. अपूर्वानन्द ने सम्मेलन का संचालन किया तथा स्थानीय आयोजक रिक्शा मजदूर यूनियन के साथी आशीष अवस्थी ने सभी आगंतुकों का स्वागत किया। सम्मेलन में मौजूद तकरीबन 800-900 लोगों को दो दर्जन से अधिक वक्ताओं ने सम्बोधित किया, जिनमें फा. जान दयाल, अनिल चौधरी, प्रो. के.एम. श्रीमाली, प्रो. राम पुनियानी, संदीप पाण्डेय, शकील सिद्दीकी, अनुपम गुप्ता, फराह नकवी, प्रो.  एन. पणिक्कर, गौहर रजा, प्रो. रूप रेखा वर्मा, नसीरूद्दीन हैदर खान, प्रो. रमेश दीक्षित, शबनम हाशमी आदि शामिल हैं।

सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव

‘‘लखनऊ में 29 नवंबर, 2010 को छात्रों, नौजवानों, स्त्रियों और समाज के अलग-अलग तबकों के नागरिकों की यह सभा जोर देकर कहना चाहती है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के इस निर्णय को अस्वीकार करना होगा, शांति और चैन की दुहाई देकर इसे स्वीकार करने की दलील को नामंजूर करना होगा और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य के तर्क की रक्षा के लिए कानूनी, राजनीतिक और सांस्कृतिक संघर्ष को नए उत्साह के साथ लड़ना होगा। यह सम्मेलन यह आह्वान करता है कि पूरे देश में व्यापक तौर पर इस फैसले की रोशनी में भारतीय धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के आगे आए खतरों पर गंभीरता से विचार करके धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में अभियान और संघर्ष को तेज किया जाये।’’

सम्मेलन के सान्ध्यकालीन सत्र में सायं 6 से 9 बजे तक आयोजित संगीत सन्ध्या में हिन्दी साहित्य के प्रख्यात कवि और विचारक अदम गोंडवी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, वृत्त चित्र निर्माता और कवि गौहर रजा, सूफी गायक नुसरत फतेह अली खान के शिष्य ध्रुव संगारी ने बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की।
इस सम्मेलन के आयोजन और सफल आयोजन में अग्रांकित संगठनों ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी-
आली, अग्रणी फाउंडेशन, एैपवा, अलग दुनिया, आशा परिवार, आवाज, बी जी वी एस, भारतीय आवाम सोसाइटी, भारतीय मुस्लिम महिला आंदांेलन, सेंटर फॉर कंटेपरेरी स्टडीज एंड रिसर्च, सीटू, बी एस एन एल एंपलॉज यूनियन, डाइनेमिक एक्शन ग्रुप, इंकलावी नौजवान सभा, जन संस्कृति मंच, बिहान, लोकहकदारी मोर्चा आदि।


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