रेल विस्तार परियोजनायें: भूमि अधिग्रहण का तीखा विरोध

सिंगूर और नंदीग्राम के प्रस्तावित भूमि अधिग्रहणों पर ग्रहण लगाने के बाद हाबड़ा के सांकराइल, बोलपुर, हुबली के डानकुनी, तारकेश्वर, विष्णुपुर, सिलीगुड़ी, पांशकुड़ा तथा शालबनी यानी हाबड़ा, शांति निकेतन, हुबली के आस पास के क्षेत्रों में रेल मंत्रालय की प्रस्तावित या बिलंबित परियोजनाओं को अमली जामा पहनाये जाने के विरोध में किसान स्थानीय स्तर पर कृषि भूमि रक्षा कमेटियांबनाकर अपनी कृषि भूमि की रक्षा के लिए पुरानी तर्ज पर संघर्ष में कूद पड़े हैं।

रेलवे द्वारा डानकुनी के पास डेडिकेटेट फ्रेट कारिडोर’, सांकराइल में रेलवे वैगन फैक्ट्री, रेलवे भर्ती बोर्ड का विशाल दफतर, नई रेलवे लाइनें, रेल बिजली उत्पादन संयत्र प्रस्तावित है। इन सारे उद्यमों के लिए जमीन की जरूरत है। अतएव यह सब प्रस्तावित स्थल किसी प्रकार के निर्माण कार्य के बजाय ऐसे किसानों के धरना-प्रदर्शन के स्थल बने हुए हैं जो अपनी जमीनों से वंचित किये जा रहे है। आंदोलनरत किसान(भू-स्वामी) रेलवे के अधिकारियों तथा ठेकेदारों को खदेड़ने में लगे हैं। रेलमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि यह सब आंदोलन सीपीएम का नाटक है और माकपा  नेता बाहर से लोगों को बुलाकर यह नाटक करवा रहे हैं। लेकिन आंदोलनकारियों के हाथों में ममता बनर्जी की पार्टी के झण्डे देखे जा सकते हैं।

सांकराइल का मामला इस वक्त ज्यादा गरम है। यहां पर भूमि अधिग्रहण आज से लगभग 28-29 साल पहले उस वक्त हों गया जब गनीखान चौधरी रेल मंत्री हुआ करते थे। यहां पर माधव राव सिंधिया के दौर में फ्रेट टर्मिनलके लिए किसानों ने जमीन दी थी। उस वक्त रेलवे ने लिखित रूप में दिया था कि प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी दी जायेगी। परंतु न तो नौकरी दी गयी और न फ्रेट टर्मिनल ही बना। फ्रेट टर्मिलनशालीमार में बना दिया गया और शेष योजनायें ठंडे बस्ते में डाल दी गयीं जिससे नौकरी पाना भी सपना ही रह गया। जब ममता बनर्जी रेलमंत्री बनीं तो उन्होने यहां डी.एम.यू. रैक बनाने का कारखाना प्रस्तावित कर दिया। 7 दिसंबर 2010 को इस नवीन परियोजना पर काम शुरू करने जब ठेकेदार तथा अधिकारी पहुंचे तो उन्हे स्थानीय लोगों ने खदेड़ दिया।

यहां के स्थानीय विधायक जो ममता बनर्जी की ही पार्टी के हैं काम रूकवाने में आंदोलनकारियों के साथ आये। आंदोलनकारियों में तथा प्रभावित किसानों में अधिकांश ममता बनर्जी एवं उनकी पार्टी के समर्थक हैं। आंदोलनकारी किसानों का दृढ़ मत है कि जब रेलवे ने यहां नयी परियोजना का निर्णय लिया है तो उन्हे आज की दर से संशोधित मुआवजा मिलना चाहिए। गांव के लोग नौकरी का भी आश्वासन चाहते हैं। परंतु रेलमंत्री ने इन दोनों निवेदनों को ठुकरा दिया और कहां कि ’’82-84 में प. बंगाल सरकार ने भूमि का अधिग्रहण करके रेलवे को दिया था अब उसके लिए हंगामा करना नाजायज है।’’

डानकुनी से लुधियाना तक प्रस्तावित (शिलान्यास 16 नवंबर 2010) ’डेडिकेटेड फ्रेट कारिडोर’, और नयी रेल लाइन बिछाने के उत्तर व दक्षिण 24 परगना, मुशर्िदाबाद, कूच बिहार, बांकुड़ा, बर्द्वमान और हुगली जिलों में 3200 एकड़ से ज्यादा जमीन अधिग्रहीत की जानी है। ये सभी जमीने दो फसली या बहु फसली हैं। तारकेश्वर विष्णुपुर ब्राडगेज जो कि सिंगुर होकर गुजरेगी; अभी से तीखे विरोध का सामना कर रही है। डंुगाझर चाय बागान के बीच से गुजरने वाली रेल लाइन का दोहरीकरण होने जा रहा है जिसमें चाय बागान की जमीन अधिग्रहीत की जायेगी, को सबसे ज्यादा विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इन योजनाओं के खिलाफ किसान अभी से बोलने लगे हैं। यह दूसरा सिंगुरअब ममता के लिए भी खतरे की घंटी बन सकता है।
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