पोस्को कम्पनी को दी गयी वनभूमि के इस्तेमाल की इजाजत


पोस्को को हरी झण्डी: मामला आर्थिक-प्रौद्योगिकी-सामरिक महत्व का या कुछ और ?

  • फैसले का आधार देश में मौजूद कानून या सरकार द्वारा नियुक्त समितियों और विशेषज्ञों की संस्तुति तथा स्थानीय लोगों की मांग नहीं बल्कि राज्य सरकार के प्रति निष्ठा एवं विश्वास
  • पोस्को जैसी परियेाजनायें आर्थिक-प्रौद्योगिकी तथा  सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्णअतएव इन्हें हरी झण्डी।
  • सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तथा सी.बी.आई. द्वारा तत्कालीन पर्यावरण एवं वनमंत्री ए. राजा (2004-07) द्वारा पर्यावरण संस्तुतियाँ (2 वर्ष में 2016) जिसमें पोस्को कम्पनी भी शामिल है, देने में निभायी गयी संदिग्ध भूमिका की जाँच की घोषणा करते ही श्री रमेश द्वारा पोस्को को हरी झण्डी दिया जाना।
  • श्री रमेश की संघीय ढांचे की चिंता में केन्द्र और राज्य सरकारें तो हैं परंतु स्थानीय निर्वाचित पंचायतें तथा स्थानीय निकाय नहीं।
  • शर्तें ऐसी जो पहले से ही लागू कानूनों, प्रावधानों तथा निर्देशों के तहत बाध्यकारी रही हैं।
  • फैसले का मतलब है एक निर्वाचित सरकार का मान तथा निर्वाचक मण्डल का अपमान।
  • यह फैसला सामूहिक संपदा के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश (28 जनवरी, 2011) की अवहेलना है।
किसी भी कीमत पर अपनी जमीन न छोड़ने के लिए उड़ीसा के जगतसिंह पुर में लोगों की लड़ाई अब भी जारी है। 2005 में ओडिसा सरकार एवं पोस्को कम्पनी के बीच हुए इकरारनामे (एम.ओ.यू.) के तहत जब ओडिसा सरकार ने पोस्को कम्पनी के लिए 1620 हेक्टअर जमीन को अधिग्रहीत करना चाहा, तब से लोग लामबंद होकर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं।


यह इस संघर्ष का ही नतीजा था कि मंत्रालय ने पोस्को कम्पनी को दी हुई मंजूरी को खारिज कर दिया लेकिन उसके कुछ ही महीनों बाद मई के महीने में, राज्य सरकार के ऊपर अपनी आस्था दिखाते हुए पोस्को को फिर से हरी झंडी दिखा दी।

2005 में ओडीसा सरकार ने पोस्को कम्पनी के साथ इकरारनामा किया था जो कानूनन 5 साल बाद यानी कि 2010 में खतम हो चुका है। केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के बाद ओडिसा सरकार तेजी से इस इकरारनामे का नवीनीकरण कराने में लग गयी। पिछले छह साल से सरकार एवं लोगों के बीच का संघर्ष तब और तेज हो गया जब सरकार ने अपने पुलिस एवं प्रशासनिक बल को जगतसिंह पुर में जमीन अधिग्रहण के लिए तैनात कर दिया। पुलिस बल ने कुछ गांव के पानवरज को तोड़ना शुरू कर दिया जिससे गांव के लोग अपनी आजीविका चलाते हैं। लेकिन फिर भी लोग अपनी हिम्मत नहीं हारे हैं पोस्को के खिलाफ डट कर खड़े हैं। गांव के सामने हर तरफ मानव श्रृंखला बनाकर लोग पुलिस एवं प्रशासन का सामना करने में लगे हैं। बच्चों ने भी इस मानव श्रृंखला में अपनी हिस्सेदारी निभायी। स्कूलों में तो पुलिस ने पहले से ही कब्जा कर रखा है। बच्चे एवं महिलायंे, धूप, बारिश की परवाह न करते हुए इस मानव श्रृंखला की अगुवाई करते रहे, ओडिसा के महिला एंव बाल कल्याण मंत्री का कहना है कि ‘‘बच्चों को इस तरह अपनी पढाई छोड़कर संघर्ष में   हिस्सेदारी नहीं निभानी चाहिए, और इसके लिए उनके मां बाप जिम्मेदार हें,’’ लेकिन बच्चे कहते हैं जब हमारी जमीन जा रही है, हमारे मां-बाप अपना रोजगार, खेती खो रहे हैं तो भूख से मरने से अच्छा है कि संघर्ष में अपनी जान दे दें।

केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के जिस फैसले के तहत जगतसिंहपुर में पोस्को कम्पनी को हरी झण्डी मिली उस फैसले का आधार देश में मौजूदा कानून या सरकार द्वारा नियुक्त समितियां और विशेषज्ञों की संस्तुति तथा स्थानीय लोगों की मांग नहीं बल्कि राज्य सरकार के प्रति आस्था एवं विश्वासको सर्वोच्च स्थान दिया गया। 2 मई 2011 को 1253 हेक्टअर वन भूमि के उपभोग चरित्र में परिवर्तन करके अपना कार्य   आरम्भ करने के लिए पोस्को को मंजूरी दे दी गयी।

उससे ठीक पहले फरवरी के महीने में ढिंकिया पंचायत के ढिंकिया एवं गोविन्दपुर के पल्ली सभा (ग्राम सभा) पूरे बहुमत के साथ इस प्रस्ताव को खारिज कर चुकी थी। इन दोनों पल्ली सभाओं में 70 प्रतिशत लोग मौजूद रहकर इस प्रस्ताव को खारिज कर चुके थे। लेकिन राज्य सरकार इन पल्ली सभाओं के प्रस्ताव को नामंजूर करते हुए कहती है कि यह सभा गैर कानूनी हैं। ओडिसा सरकार की इन्हीं बातों को आधार बनाते हुए केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश, पोस्को को मंजूरी देने के पीछे तीन वजह बताते  हैं जो कि इस प्रकार हैं:-

1. ढिंकिया एवं गोविन्दपुर गांव के पल्ली सभा में बहुमत नहीं बन पाया था, सिर्फ कुछ गिने चुने गांव वाले ही इन सभाओं में मौजूद थे।
2. ओडिसा ग्राम पंचायत कानून 1964 एवं वन अधिकार अधिनियम 2006 में दिये गये फार्मट के हिसाब से इन पल्ली सभाओं को कानूनी तौर पर संचालित नहीं किया गया।
3. ग्राम पंचायत के नियमों के हिसाब से इस प्रस्ताव को कर्यवाही रजिस्टर में लिखते हुए पंचायत सचिव के हस्ताक्षर नहीं लिए गये।

वहीं दूसरी तरफ पल्ली सभा के बारे में जानते हुए भी पंचायत सचिव इसमें नहीं आते हैं, एवं जिस पल्ली सभा के प्रस्ताव को केन्द्रीय मंत्रालय एवं राज्य सरकार को भेजा गया है। उसमें 70 प्रतिशत लोगों ने हस्ताक्षर किये हैं। राज्य सरकार पर अपनी आस्था एवं विश्वास को दिखाते हुए केन्द्र सरकार अपने ही लोगों के खिलाफ अपनी मंशा को जाहिर कर चुकी है। केन्द्र सरकार द्वारा गठित कमेटी अपनी    संस्तुति में पहले ही इस परियोजना को रद्द करने की बात कर चुका है। लेकिन इन संस्तुतियों को भी मानने के लिए सरकार तैयार नहीं है सिर्फ कुछ फेर बदल को छोड़कर।

इसी मई के महीने से ढिंकिया, गोविन्दपुर एवं पोस्को प्रकल्प में आने वाले बाकी गांव के लोग भी धूप व बारिश से न डरते हुए, बीमार होते हुए भी अपने गांव को, अपने जमीन को बचाने के लिए मानव श्रृंखला के जरिये संघर्षरत हैं। पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति के लोगों के इस संघर्ष को सलाम करते हुए विभिन्न जन संघर्षों के साथी, राजनीतिक दलों के नेता ढिंकिया में पहुंचते रहे एवं लोगों का हौंसला बढ़ाते रहे। इसी दौरान दिल्ली एवं बाकी शहरों में भी जन संघर्षों के साथी पोस्को प्रतिरोध संघर्ष समिति का साथ देने के लिए, धरना/प्रदर्शन आयोजित करते रहे।

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के इस निर्णय के खिलाफ अपनी जमीन ,वन तथा जीविका के आधार को बचाने के लिए पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति की अगुवाई में लोग एक बार फिर से मजबूती के साथ संघर्ष के रास्ते पर उतर आये हैं। धरना, प्रदर्शन, बैरीकेटिंग तथा मानव श्रृंखला बनाकर लोग संघर्ष को तेज कर रहे हैं। राजनीतिक दलों तथा देश के तमाम जन संघर्षों ने इस संघर्ष के साथ एकजुटता का प्रदर्शन एक बार पुनः किया है। सरकार आंख मिचौली का खेल खेल रही है।

सरकारी दमन का आलम यह है कि 17 जुलाई 2011 को शांतिपूर्ण धरना कर रही महिलाओं पर नुआगाँव में पुलिस ने लाठीचार्ज करके 6 महिलाओं समेत दर्जनों लोगों को घायल कर दिया। एक महिला को गंभीर हालत में कुजंगा के सरकारी अस्पताल में भरती करना पड़ा।

15 जुलाई को मुख्यमंत्री आवास की तरफ जुलूस ले जाते समय सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। 

पोस्को के खिलाफ पोस्को प्रतिरोध संग्राम समिति एवं ढिंकिया, गोविन्दपुर एवं अन्य ग्रामवासियों के इस संघर्ष को सलाम! जो अपनी जमीन को अपनी धरोहर समझते हुए इसके लिए जान देने को भी तैयार हैं।

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