कनहर नदी पर बँध रहे बाँध की त्रासदी

सोनभद्र का विकास वनाम विस्थापन 

सोनभद्र का इलाका औद्योगिक  विकास के लिहाज से प्रदेश में एक बडी हैसियत रखता है। यह अलग बात है कि आदिवासियों को इसका फल निरंतर विस्थापन व बदहालियों के घनीभूत  हो जाने के रुप में मिलता रहा है। रेनुकूट स्थित हिन्डालको एशिया का सबसे बड़ा एल्यूमिनियम संयंत्र है। बिड़ला समूह के इस  उपक्रम में 5000 से भी अधिक मजदूर काम करते हैं। बिड़ला हाइटेक कार्बन प्लांट भी इसी क्षेत्र में हैं इसके अलावा शक्तिनगर तथा बीजपुर में एन0टी0पी0सी0 विद्युत संयंत्रों की श्रृंखला है जिसका नियंत्रण केन्द्र सरकार के हाथ में है। यह औद्योगिक इलाका मिनी मुम्बई के नाम से जाना जाता है। इस आइने से जिले के औद्योगिक विकास एवं कद के रुतबे का अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है इसके तार सियासी गलियारे तक कितने मजबूत बंधे हैं।

इस औद्योगिक विकास की शुरुआत 1953 में रिहन्द बॉध निर्माण के साथ हुई। पूर्णतया कंकरीट का बना हुआ पक्का बॉध गोविन्द बल्लभ पन्त सागर के नाम से एशिया की सबसे बडी कृत्रिम झील के रुप में जाना जाता हैं। इस बॉध के निर्माण से 46 हजार ग्रामीण आदिवासी (105 गॉवों के) विस्थापित हुए हैं। इसके बाद ओबरा में थर्मल पावर प्लांट का निर्माण कर एन0टी0पी0सी0 की स्थापना के साथ एक के बाद एक सुपरतापीय बिजली घरों की परियोजना एवं अन्य परियोजनाओं का जाल इस क्षेत्र में बिछना शुरू हुआ। चुर्क व डाला में सीमेंन्ट फैक्ट्री के लिए अनेक निर्माण कार्यो के लिए 250 से ज्यादा क्रेशर उद्योग एवं चूने के पत्थर के कारखानों द्वारा निःसंदेह इस क्षेत्र में औद्योगिक विकास का परचम लहरा रहा हैं। किन्तु सत्य यह भी है कि ऐसे छोटे-बड़े सभी उद्योगों, औद्योगिक बस्तियों ने अनेक आदिवासी परिवारों को उजाड़ा है उनको उजाड़ने के बाद इनकी जीविका, जिंदगी तथा अस्तित्व की रक्षा के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किये गये हैं। कई तो ऐसे गांव हैं जिन्हें विस्थापित करके बसाया गया और फिर नयी-नयी परियोजनाओं के नाम पर कई-कई बार उजाड़ा गया है।

सर्वेक्षण के अनुसार रिहन्द बाँध से 10 हजार परिवार, सीमेंन्ट फैक्ट्री से 800 परिवार, कनहर बॉध से 200 परिवार, अनपरा व ओबरा से 1500 परिवार, वर्ल्ड  फूड प्रोग्राम फारेस्टी प्रोजेक्ट से 1 हजार परिवार, एन0टी0 पी0सी0 से 700 परिवार  तथा रोड रेलवे, हेलिपैड,    हाइटेंशन लाइन से 15 हजार परिवार प्रारम्भिक दौर में विस्थापित हुए। इन विभिन्न परियोजनाओं के लिए बिना किसी राष्ट्रीय मानक के बगैर, नौकरी के, लालच में इस क्षेत्र के 36 हजार परिवार 1 से 3 बार विस्थापित हो चुके हैं। इन उद्योगों की स्थापना से जंगलों का बड़े पैमाने पर विनाश हुआ। रिहन्द जलाशय के पानी के साथ-साथ सिंगरौली व दुद्धी क्षेत्र के हवा, पानी व मिटटी प्रदूषित हुई है। इस क्षेत्र के कुओं में निर्धारित सीमा से 9 गुना अधिक पारा मौजूद है। यह चिन्ता का विषय है। यही नही कन्नौरिया द्वारा 420 किग्रा0 हर वर्ष पारा एवं हिन्डालको द्वारा 435 टन हर वर्ष फ्लोराइड का उत्सर्जन होने का अनुमान है। ‘‘कमरीडाँड़, लभरी, गाढ़ा, देव हत्थी गांवों के 15 बच्चों की मौत जनवरी माह में रिहन्द का जहरीला पानी पीने से हो चुकी है।’’

आज हालत यह है कि जे0पी0 सीमेण्ट कम्पनी के आगमन ने चुर्क, राबटर््सगंज के पास के गांवों को बाड़ा बद्ध कर दिया है तथा उसकी बाड़े बंदी का विरोध करने वाले स्थानीय आदिवासियों को अपराधिक मुकदमों में फंसाया गया।

गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता महेशानन्द का कहना है कि ‘‘पर्यावरण पर इतने खतरे के बावजूद भी सत्ता दल एवं भू.पू. सत्ता दलों के तमाम नेताओं के अवैध स्टोन क्रशर इलाके में चल रहे हैं, इनमें कैमूर सेंचुरी एरिया-मुरैया पहाड़ी, पोलवा व पिपरीडीह, बिल्ली मारकुण्डी, अहरौरा-सोनपुर गांव, पटवध गांव तथा कनहर नदी कोरगी शामिल हैं। इतना ही नहीं सोन नदी को बंधक बना लिया गया है। चोपन ब्लाक के अगोरी किले के सामने सोन नदी पर पुल व सड़क बनाकर नदी की धारा मोड़ दी गयी है और जे.सी.बी. मशीनें लगाकर चौबीसों घण्टे बालू का खनन किया जा रहा है। इलाहाबाद      हाईकोर्ट के निर्देश कि नदियों में जेसीबी मशीनों से बालू खनन नहीं किया जा सकता, आज भी जे.सी.बी. मशीनों से बालू का खनन सोन नदी में कायम है। सोन नदी पर जगह-जगह बने पुलों के कारण सोन लिफ्ट सिंचाई परियोजना दम तोड़ती जा रही है।

वे आगे कहते हैं कि भू माफियाओं, खनन मािफयाओं तथा जे.पी. जैसी कंपनियों के लिए सरकार के पास जमीन है मगर आदिवासियों को उजाड़ने के बाद भी उन्हें देने के लिए उसके पास जमीन चुक जाती है। उन्होंने वन अधिकार अधिनियम का उदाहरण देते हुए बताया कि इस इलाके में 54000 दावे किये गये परंतु केवल 5200 को पट्टा मिला वह भी वास्तविक कब्जे वाली जमीन का तिहाई-चौथाया। वे बड़ी गंभीरता के साथ कहते हैं कि रिहन्द जल विद्युत परियोजना, सिंगरौली, बीजपुर, रेनूकूट, बीना कोयलरी, अनपरा के कारण विस्थापित किये गये आदिवासी आस-पास के जंगलों में बस गये उन्हें वहां से पुनः विस्थापित किया गया। इनकी तादाद 20 से 25 हजार परिवार के लगभग थी। उनका कुछ अता-पता नहीं। जो थोड़े-बहुत जंगलों में बसे भी हैं उन्हें धारा-20, आरक्षित वनों तथा कंपनियों के विस्तार के लिए फिर उजाड़ा जा रहा है।

अभी 20 फरवरी 2011 को वन अधिकार अधिनियम के संदर्भ में राबर्ट्सगंज में उ.प्र. ग्रामीण एवं खेतिहर मजदूर यूनियन तथा डायनेमिक एक्शन ग्रुप (डग) द्वारा आयोजित जन सुनवाई में निकलकर जो बातंे आयीं वे हालात की तस्वीर पेश करती हैं। इस अधिनियम के क्रियान्वयन पर जन सुनवाई में आये लोगों ने ग्राम स्तरीय समितियों के गठन में मनमानापन, सामुदायिक भूमि दावों का आंख मूंदकर निरस्तीकरण, ग्राम वन अधिकार समितियों के अधिकारों की अवहेलना, प्रस्तुत दावों की अनदेखी, उपखण्ड स्तरीय समितियों द्वारा बहुत कम दावों को    स्वीकारना, अन्य परम्परागत वन निवासियों के दावों को नकारना और विभिन्न औद्योगिक प्रतिष्ठानों द्वारा वन वासियों की जमीनों पर कब्जा और आदिवासियों की बेदखली जैसे गंभीर मुद्दों को सामने रखा।

डग के साथी रामकुमार का कहना है कि ‘‘सोनभद्र जिले की तमाम जमीनों, जिन पर मुख्यतया आदिवासी-दलित बसे हैं, को सरकार जे.पी. कंपनी को देने पर आमादा है। यह आदिवासियों-दलितों तथा परम्परागत वन वासियों के अस्तित्व पर हमला है तथा जमीन, पानी, जंगल की खुली लूट का गेट पास हैं इसका प्रतिकार हर स्तर पर एकजुट होकर करना होगा।’’

कनहर बाँध परियोजना विरोधी  संघर्ष कदम-दर-कदम संघर्ष के निशान 

योजना की शुरूआत का शिलान्यास : 6 अक्टूबर 1976, आपातकाल के दौरान उ. प्र. के तत्कालीन   मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी द्वारा।

फसलों के नष्ट किये जाने का विरोध : वर्ष 1977, सुंदरी गांव में सिंचाई विभाग द्वारा किसानों की खड़ी फसल को  तथा क्षतिपूर्ति की प्राप्ति नष्ट करके ईंट भट्ठा लगाया गया। किसानों ने विरोध किया, बाद में उन्हें 1800 प्रति बीघे की दर से क्षतिपूर्ति मिली।

डूब क्षेत्र का गजट तथा सर्वे :     4-12-1978 को उ. प्र. सरकार की तरफ से डूब क्षेत्र का गजट किया गया। इसके बाद डूब क्षेत्र का सर्वे करके घर, जमीन, आबादी, पेड़, पशु, मंदिर, मस्जिद, कब्रिस्तान तथा स्कूलों की गणना की गयी, इनका सर्वे किया गया।
भूमि-अधिग्रहण, मुआवजे तथा
मुआवजे की तय दर पर विरोध :     वर्ष 1979 से 1984 तक यह तीखा विरोध चलता रहा। मुआवजे की दर तय करने के लिए सरकार ने  नायाब तरीका अपनाया। चूंकि पूरे डूब क्षेत्र के किसी भी गांव की जमीन की रजिस्ट्री नहीं हुई थी, अतएव डूब क्षेत्र के बाहर के एक गांव बँघाड़ू की एक रजिस्ट्री जो 2000/- रुपये प्रति बीघे की दर से थी के आधार पर मुआवजा तय कर दिया गया। लोगों ने इसका जबर्दस्त विरोध किया।

मुआवजा ले लेने के लिए
प्रशासनिक दबाव का विरोध :      वर्ष 1979 से ही किसानों के ऊपर यह दबाब बनाया गया कि वे मुआवजा ले लें। भूमि-अधिग्रहण अधिकारी ने यहां तक धमकी दी कि मुआवजा जो भी मिल रहा है वह ले लो नहीं तो कुछ भी नहीं मिलेगा। भयवश कुछ लोगों ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए मुआवजा ले लिया।
बांध की नींव का काम, बिना किसी
नोटिस के लोगों के घरों को उजाड़ना  : इस बीच वर्ष 1979 से 1984 के बीच तमाम विरोध-प्रतिरोध के बावजूद भी ताकत के बल पर बांध के लिए मिट्टी की खुदाई की गई तथा कुदरी, बरदघरी, सुगुआमान, भीसुर गांव के घरों को भी खोद दिया गया। लोगों को नोटिस भी नहीं दिया गया और उजाड़े गये लोगों का आज तक अता-पता नहीं हैं आसपास के गांवों की मिट्टी खोदी गयी तथा कोई क्षतिपूर्ति भी नहीं की गयी।
काम बंदी का दौर (1)
हल्के-फुल्के काम का दौर :                         वर्ष 1987 से 1995 तक सभी प्रकार का निर्माण कार्य बंद रहा। एकबार पुनः 1995 में हलका-फुलका साफ-सफाई का काम तथा सड़ रही मशीनों, गोदामों, साइट ऑफिस, फील्ड हॉस्टल के मेंटीनेंस का काम किया गया।

काम बंदी का दौर (2) :                      1995 से 2001 तक काम बंद रहा।

कनहर बचाओ आंदेालनकी स्थापनावर्ष 2001 में एकबार फिर से काम शुरू करने की कोशिश की गयी। इस बार प्राइवेट कंपनियों को काम सौंपा गया। स्थानीय लोगों ने काम बंद करवा दिया तथा वर्ष 2002 में विश्वनाथ खरवार, सादिक हुसैन, फनेश्वर,जीतन राम, जीत सिंह, शिवप्रसाद तथा बीपत यादव की अगुआई में कनहर बचाओ आंदेालन की शुरूआत हुई।
आंदोलनकारियों ने काम रुकवाया
तथा मशीनों को वापस भगाया :     वर्ष 2002 में एक बार पुनः काम शुरू कराने की कोशिश को कनहर बचाओ आन्दोलनकी अगवाई में हजारों लोगों ने कार्यस्थल पहुंचकर मशीनों को वापस कराकर रुकवा दिया।
काम बंदी का दौर (3) :                       इसके बाद वर्ष 2002 से वर्ष 2010 तक काम एकदम बंद रहा।

परियोजना की नयी शुरूआत की घोषणाउ. प्र. की मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जन्मदिन के मौके पर इस परियोजना को नये सिरे से शुरू करने की घोषणा की (15 जनवरी 2011) सैटेलाइट के माध्यम से परियोजना का लखनऊ में ही बैठकर नया शिलान्यास किया गया तथा फील्ड हास्टल में सरकारी अमले ने पत्थर चुनवा दिया।
पहुंच मार्ग बनाने की तैयारी :        मार्च 2011 में बांध तक सामान- मिट्टी आदि पहुंचाने के लिए कनहर नदी पर रपटा बनाने की शुरूआत तथा लेवेलिंग आदि कार्यों की योजना।

विरोध प्रदर्शन:                                    कनहर बांध के विरोध में अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए 25 कि.मी. पैदल चलकर हजारों लोगों ने 15 मार्च 2011 को किया तहसील कार्यालय का घेराव, सौंपा मांग-पत्र।
न्यायालय जाने की तैयारी :             मार्च 2011 में अपनी बातें न्यायालय तक पहुंचाने का लिया गया फैसला।
समर्थन में आये अन्य संगठन तथा
जन संघर्ष और जन-प्रतिनिधि :       कनहर बचाओ आंदोलन के समर्थन में धीरे-धीरे कई संगठन जुड़ते जा रहे  हैं। पी.यू.सी.एल., इण्डियन सोशल एक्शन फोरम (इंसाफ), भूमि अधिग्रहण के विरोध में चलने वाला बभनी का संघर्ष, गंगा एक्सप्रेस-वे विरोधी कृषि भूमि बचाओ मोर्चा, उ.प्र., सेज विरोधी संघर्ष समिति, उ.प्र. के अलावा जिला परिषद सदस्यों, बी.डी.सी. सदस्यों तथा ग्राम प्रधानों, मजदूर संगठन इण्टक आदि।

हरियाली लाओ के नाम पर आंदोलन
के विरोधी हो रहे हैं एकजुट :           कनहर बचाओ आंदेालन की वजह से जिन ताकतों की स्वार्थ सिद्धि में बाधा उत्पन्न हो रही है वे हरियाली लाओ का नारा देकर लोगों को गुमराह करने की साजिश तेज कर रहे हैं।

‘‘डूब क्षेत्र में आने वाले संभावित गांवों/बस्तियों की सूची’’
राज्य- छत्तीसगढ़, जिला सरगुजा, ब्लाक रामचन्द्रपुर
   1.   जयनगर कालोनी      2.   कुसफर       3.    सेमरवा          4.     लिबरा     5.      हौली               
   6.  सोनावल              7. पचावर        8.    कमेश्वर नगर 9.   विशुनपुर 
  10.   पीपर पान          11.  बैर पान      12.  चेरा                 13.  चूना पाथर         
  14.  ब्याही महुआ         15.  आरा             16.    तिरसुली      17.  टेमना          
 18.   भुसुड़िया                 19.   सेलिया       20.    इन्दरावतीपुर  21.   ओरंगा
  22.   सुन्दरपुर         23.  भागोडीह      24.    हिण्डो               25.   सलवाही            
 26.    फूली डूमर       27. लमहर टेाला    28.    अनंदपुर      29.    बरवाही          
 30.   सिलाजो                 31.  मनकेरी      32.   जरूआ        33.     दोलमी
  34.   खरका         35.   गुआदा       36.    दुगरू            37.          अनभुल           
 38.   डूमर पान       39.  भुइन डीह        40.  बेलवा दामर

राज्य- झारखण्ड, जिला- गढ़वा, ब्लाक ढुरकी
                                1. फेफसा           2. केकरहा           3. सँवाठी      4. बाल चौरा  
                                5. भमफोर           6. माझपानी         7. सेमरवा     8. सुरू.

राज्य- उत्तर प्रदेश, जिला सोनभद्र, ब्लाक म्योरपुर एवं बभनी
1. सुंदरी            2. रगनियाँ दामर      3. करिलेवा          4. दुधमनिया
5. गांेहड़ा           6. दीला टोला        7. गंगहर            8. धूमा
9. लामी            10. डुमरिया          11. बघमनवा         12. झाँपी पहरी
13. पुरवी देहवार     14. पश्चिमी देहवार    15. ढोल पाथर        16. बैरखड़
17. कसियवा खाँड     18. कुदरी           19. बरदघट्टी         20. भीसुर
21. महुआ दामर      22. रंदह टोला        23. कोरची           24. नाचन टाँड़
25. ओखरिया दामर   26. बीया दामर       27. पथौरी-चटान       28. अदनिया खाँड़
29. बहेरा खाड़ी       30. अहिर गुड़वा       31. मनरू टोला       32. देवकुछ़
33. कुड़ पान         34. बेलहरा           35. तेंदुवल.          36. कुदरी
-वीरेन्द्र प्रताप सिंह, दुद्धी, सोनभद्र से

बभनी का भूमि बचाओ आंदोलन
उत्तर प्रदेश राज्य के सोनभद्र जिले की दुद्धी तहसील के बभनी ब्लाक में उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन ने एक थर्मल पावर प्लांट बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए 650 हेक्टेअर भूमि की जरूरत पड़ेगी। अतएव सरकार ने भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही शुरू कर दी है। सीधे तौर पर प्रभावित होने जा रहे गांवों के लोगों ने अपनी बैठकें, जनसंपर्क तेज कर दिये हैं तथा अपनी जमीन बचाने के लिए संघर्ष के रास्ते पर हैं।

कनहर बचाओ आंदोलन
कनहर बचाओ आंदोलन के अगुआकारों को इस बात की पूरी आशंका है कि प्रस्तावित कनहर बांध के पानी का उपयोग स्थानीय निवासियों, ग्रामवासियों के बजाय आस-पास स्थित निम्न कारखानों एवं फैक्ट्रियों के लिए किया जाएगाः-
कारखाना                                         प्रस्तावित कनहर बांध से दूरी
1. अलम्युनियम फैक्ट्री, रेनुकूट, (बिरला ग्रुप),                                                          50 किलोमीटर
2. हाईटेक कार्बन, रेनुकूट, (बिरला ग्रुप),                                                                    50 किलोमीटर
3. कनोरिया केमिकल्स, रेनुकूट,                                                                                50 किलोमीटर
4. रिहन्द बांध, हाइड्रोइलैक्ट्रिक प्लांट, रेनुकूट,                                                           55 किलोमीटर
5. अनपरा थर्मल पावर प्लांट, रेनुकूट, (अनपरा, उ. प्र. सरकार उपक्रम)        80 किलोमीटर
6. रिहन्द विद्युत परियोजना, रेनुकूट, शक्तिनगर, एन.टी.पी.सी              110 किलोमीटर
7. विन्ध्यांचल विद्युत परियेाजना, बीजपुर (एन.टी.पी.सी.),                                  120 किलोमीटर
8. सीमेंट फैक्ट्री, डाला (जे.पी. ग्रुप)                                     60 किलोमीटर


सारी परियोजनायें कार्यरत हैं डूब क्षेत्र में
(समझ से परे है बाँध परियोजना की अबूझ पहेली)

एक तरफ जहां 1976 से डूब क्षेत्र के इलाकों की घोषणा कर दी गई है, वहीं दूसरी तरफ आज तक सरकार के विभिन्न विभागों द्वारा निर्माण कार्य जारी है। अभी हाल में ही प्रधानमंत्री सड़क सम्पर्क मार्ग योजना, लोक निर्माण विभाग एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा डूब क्षेत्र के कोरची, सुंदरी, गोहड़ा और भीसुर गांव में क्रमशः 18, 9, 25 एवं 10 किलोमीटर सड़कें बनाई गयी हैं। भीसुर गांव का सामुदायिक भवन अभी फरवरी 2011 में बनकर तैयार हुआ है। डूब क्षेत्र के इन ग्राम पंचायतों- सुंदरी, कोरची, भीसुर एवं गोहड़ा में पंचायत भवन, सामुदायिक भवन प्राइमरी स्कूल, बिजली की लाईन, उप स्वास्थ्य केन्द्र एवं हैंडपाईप आदि अभी हाल में ही लगाए और बनाए गये हैं। इस घोषित डूब क्षेत्र में वन अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत लोगों को पट्टे भी दिये गये हैं। यह कैसा विकास है ? डुबाने से पहले की सजावट या कुछ और ?
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