संवैधानिक प्रावधान लागू कराने की मांग भी सत्ता को स्वीकार नहीं : विधानसभा घेरने जा रहे आदिवासियों पर निर्मम लाठी चार्ज


सत्ता की कथनी-करनी का गंभीर फर्क बार-बार सामने आता रहता है। भारतीय संविधान में आदिवासियों की विशष्टताओं को देखते हुए उनके लिए विशेष प्रावधान पांचवीं एवं छठवीं अनुसूची के रूप में किये गये हैं और वन अधिकार अधिनियम बनाते समय भी घड़ियाली आँसू बहाते हुए कहा गया था कि ऐतिहासिक अन्यायों को समाप्त करने के लिएयह कानून लाया गया है जिससे कि आदिवासियों के साथ न्याय हो सके। परंतु जब इन विधानों के प्रावधानों को लागू करने की मांग की जाती है तो ऐसा करने वालों को अपराधी, देशद्रोही तथा विकास विरोधी की उपाधियां देकर उनके साथ सख्ती से निपटा जाता है और सख्ती का मतलब है लाठी, गोली, दमन और गिरफ्तारी।


ऐसा ही कारनामा छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने आदिवासियों के साथ 19 मार्च 2012 को रायपुर में कर दिखाया।

पूरे छत्तीसगढ़ से आये आदिवासियों ने गोंडवाना भवन में सभा करने के बाद विधानसभा घेरने के लिए सोमवार 19 मार्च की दोपहर तीन बजे कूच किया। प्रदेश में छठी अनुसूची लागू करने सहित कई मांगें मनवाने के लिए आदिवासी अपने परंपरागत हथियारों फरसा और तीर कमान लिए विधानसभा को घेरने जा रहे थे। पुलिस ने आदिवासियों के जुलूस को आगे बढ़ने से रोका परंतु आदिवासी विधानसभा तक जाना चाहते थे, आदिवासियों की भारी संख्या से घबरायी पुलिस ने आदिवासियों को तितर-बितर करने के लिए पहले तो पानी की धार तथा आंसू गैस के गोले छोड़े लेकिन इसके बाद पुलिस ने आदिवासियों पर जमकर लाठियां भांजी। पुलिस ने आदिवासियों की बेदर्दी से पिटाई की और तो और सभा स्थल पर खाना खा रहे आदिवासियों को भी पुलिस नहीं बख्शा। पुलिस के लाठी चार्ज में आदिवासी समाज के नेता बीपीएस नेताम सहित पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम तथा कई आदिवासी नेता घायल हुए। लाठीचार्ज के बाद पुलिस ने सैकड़ों की संख्या में आदिवासियों को गिरफ्तार करके सेंट्रल जेल में भेज दिया। इसमें बीपीएस नेताम, फूल सिंह नेताम, देवेन्द्र सहित कई आदिवासी शामिल हैं।

सर्व आदिवासी समाज के प्रमुख बीपीएस नेताम का कहना है कि ‘‘राज्य सरकार आदिवासियों का हित नहीं चाहती। यही वजह है कि आदिवासियों की सरकार आदिवासियों पर अत्याचार कर रही है। इसका खामियाजा सरकार को भुगतना होगा। आदिवासियों की जंग आगे भी जारी रहेगी।
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