कुडनकुलम से भारत के नागरिकों के नाम खुला पत्र

प्रिय साथियों
हम कूडनकुलम से आया यह भारतीय नागरिकों के नाम खुला पत्र हिन्दी में अनूदित कर आप तक पहुँचा रहे हैं। इसमें वहाँ चल रहे आँदोलन के साथियों ने विदेशी फंडिंग जैसे सरकारी झूठ से सचेत रहने और स्थानीय लोगों की जीविका, सुरक्षा और पर्यावरण के मद्देनजर इस आंदोलन को व्यापक समर्थन देने की गुहार की है।

आपसे अनुरोध है कि इस चिट्ठी को आगे बढ़ाएँ और ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएँ।
कुडनकुलम से भारत के नागरिकों के नाम खुला पत्र

भारत के प्रिय बहनों तथा भाइयों

नमस्कार ! हमारे संघर्ष में आपके द्वारा उत्साही रुचि लेने तथा हमारे आंदोलन के उद्देश्य को समर्थन देने के लिए आप हमारा तहेदिल से शुक्रिया स्वीकार करें। जैसा कि आप जानते हैं हम मछुआरे, किसान, दुकानदार, दलित, श्रमिक, बीड़ी बनाने वाली महिलायें 1980 से ही कुडनकुलम न्यूक्लियर पॉवर प्रोजेक्ट (केकेएनपीपी) के खिलाफ संघर्षरत हैं।

यह रशियन संयंत्र सोवियत यूनियन टूटने के बाद ठंडे बस्ते में चला गया था, 1997 में इसे दुबारा से स्वीकारा गया। भारतीय सरकार रूसियों के साथ मिलकर 2 बड़े रियक्टरों का निर्माण कर रही है, प्रत्येक रियक्टर 1000 मेगावाट की क्षमता का है। इसे बनाने से पूर्व भारत सरकार ने स्थानीय लोगों के साथ न तो कोई सलाह मशवरा किया और न ही उनकी सहमति ली। 23 सालों के लंबे और कड़े संघर्ष के बाद हमें इनवार्यनमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट (EIA) की पुरानी रिपोर्ट की प्राप्ति हुई है। भारतीय परमाणु अधिकारियों ने स्थानीय लोगों के साथ इस संयंत्र के बारे में किसी भी तरह की जानकारी साझा नहीं की है। इस संयंत्र से रोजाना कितने विकरण का उत्सर्जन होगा? इन रियक्टरों से कितना परमाणु कचरा निकलेगा तथा उसे कहां और कैसे ठिकाने लगाया जायेगा, इस संयंत्र के लिए कितनी मात्रा में ताजे पानी की जरूरत होगी, संयंत्र से निकले हुए दूषित पानी का हमारे समुद्र तथा उसमें रहने वाले जीव-जन्तुओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा? इस संयंत्र की अवधि पूरी हो जाने पर इसे बंद करने की प्रक्रिया की क्या कीमत होगी? तथा इसके क्या प्रभाव होंगे? इस संयंत्र में  रशियन की क्या जवाबदेही होगी? इन सभी सवालों का पूरा और सच्चा जवाब हमें अभी तक नहीं मिला है। इस सब से हम अत्याधिक परेशान हैं।

हमारे लोगों ने 11 मार्च 2011 को फुकुशिमा दुर्घटना को टी.वी. पर देखा और परमाणु हादसों की भयावहता तथा दुष्प्रभाव को समझा। उसके तुरंत ही बाद 1 जुलाई 2011 को कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र (के.के.एन.के.पी.) ने रियक्टरों का ‘‘हाट रन’’ शुरू किया, जिससे बहुत शोर तथा धुआं पैदा हुआ, साथ ही अधिकारियों ने इस मॉक ड्रिलमें लोगों को अपने नाक, मुंह ढॉप कर जिंदगी बचाने के लिए रियक्टर से दूर जाने को कहा। इस घटना की वजह से कुडनकुलम इंदिताकराई गांव के लोगों ने एक बार फिर से इस संयंत्र के विरोध का मन बना लिया और 11 अगस्त 2011 से सड़क पर उतर आये। फिर हमने 16 अगस्त 2011 को एक दिन की भूख हड़ताल इंदिताकराई में, और 17 से 19 अगस्त 2011 तक 3 दिनों की भूख-हड़ताल कुडनकुलम में करना तय किया। 17 अगस्त को ही अधिकारियों ने हमें बातचीत के लिए बुलाया और कहा कि आगामी सितम्बर तक हम हिंदु और मुस्लिम त्यौहारों को देखते हुए अपना आंदोलन टाल दें। लेकिन इसके कुछ ही दिनों के अंदर परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष ने यह घोषणा की कि पहली सितम्बर 2011 से रिएक्टर स्थापित करने का काम शुरू कर दिया जायेगा।

तब हमने 11 सितम्बर 2011 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। क्योंकि राज्य और केन्द्र सरकारें लगातार हमें अनदेखा कर रही थीं। इसलिए महिलाओं, बच्चों ने 13 सितम्बर को कुछ घंटों के लिए एक सरकारी सड़क को बंद कर दिया। राज्य की मुख्यमंत्री ने 21 सितम्बर को हमें बातचीत के लिए बुलाया और अगले दिन राज्य की कैबिनेट ने एक प्रस्ताव परित किया जिसमें केंद्र सरकार से स्थानीय लोगों की आशंकाओं के दूर होने तक और सवाल सुलझने तक कुडनकुलम में सारा काम रोकने की मांग की गई थी। हम लोगों ने 22 तारीख को अपनी भूख हड़ताल खत्म कर दी लेकिन जब प्रधानमंत्री से हमारी वार्ता असफल हो गयी हमें 9 से 16 अक्टूबर तक फिर भूख हड़ताल पर जाना पड़ा। जब कुडनकुलम परियोजना के अधिकारियों ने राज्य सरकार के प्र्रस्ताव के मुताबिक निर्माण कार्य नहीं रोका तब हमने 13 से 16 अक्टूबर 2011 तक के.के.एन.के.पी. की परियोजना क्षेत्र को घेर लिया। अक्टूबर 17 के स्थानीय चुनावों में अपने इलाके के लोगों की भागेदारी के लिए हमने 17 अक्टूबर को भूख हड़ताल तथा घेराव दोनों को समाप्त कर दिया। तब से हम लोग विशाल रैलियाँ, जनसभाएं, गांवों के दौरे, सेमिनार तथा अपने सिर मुंडवाने, सड़क पर खाना बनाने और परमाणु बिजली घर के पुतले जलाने जैसे प्रतिरोध लगातार कर रहे हैं।

यह संघर्ष 197 दिनों से चल रहा है और लोगों का हौसला अभी भी बहुत ऊंचा है। यह हमारे जीवन और जीविका को बचाने की सीधी लड़ाई है और इसमें किसी दूसरे देश की सरकार, एजेंसी और पैसा शामिल नहीं है। हमारे मछुआरे, किसान, मजदूर तथा औरतें छोटी राशियां इकट्ठा करते हैं और इस सरल गांधीवादी संघर्ष को जारी रखे हैं। हमारी जरूरतें बहुत कम हैं और इसलिए खर्च भी बहुत छोटा है। हम भूख हड़ताली साथियों और मेहमानों को सिर्फ सुरक्षित साफ पानी मुहैया कराते हैं। पूरे तमिलनाडु और कभी-कभी देश के दूसरे हिस्सों से लोग अपनी व्यवस्था खुद करके इस आंदोलन में शामिल होते रहे हैं। हम अपने यातायात के लिए कभी-कभी स्थानीय टैक्सियों का प्रयोग करते हैं। लोगों की सच्ची भावनाओं को समझने और हमारी मांगें मानने के बजाय सरकार ने हमारे आंदोलन के नेताओं पर राष्ट्रद्रोह और भारतीय राज्य के खिलाफ युद्ध करने जैसे संगीन आरोपों पर झूठे केस दायर कर दिये हैं। हम सब पर 180 से लेकर 200 केस तक दायर किये गये। पुलिस की प्रताड़ना, खुफिया अधिकारियों द्वारा पीछा, अखबारों में मनगढंत झूठी खबरें, हमारे घर के सदस्यों को धमकी, घृणा भरी चिट्ठियाँ, जान से मारने की धमकियाँ और षारीरिक हमले लगातार हो रहे हैं।

इसके बावजूद कि भारत एक लोकतंत्र है दिल्ली की सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों की रक्षा करने और अमेरिका, रूस तथा फ्रांस जैसे ताकतवर मुल्कों को खुश रखने में ही रुचि दिखाती है। इस देश के आम लोगों की भलाई उसकी प्राथमिकता में नहीं है। केंद्र सरकार तथा कांग्रेस पार्टी विभिन्न देशों के साथ किये गये गुप्त परमाणु समझौतों से चिपकी हुई है और हमें विकास की राह में बाधा बताती रहती है। भाजपा जो कि सबसे बड़ा विपक्षी दल है, की रुचि परमाणु बम में है और वह भारत को सुपर पॉवरबनाना चाहती है। इसीलिए उसको परमाणु से जुड़ी हर चीज से प्यार है। यह विडम्बना है कि इन दोनों भ्रष्ट और साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने ही लोगों के खिलाफ जाकर एक दूसरे से हाथ मिला लिये हैं। यह खुद तो अपने अमेरिकी आकाओं के सामने झुके रहते हैं, लेकिन हमारी ईमानदारी तथा देश प्रेम पर सवाल खड़े करते हैं।

कांग्रेस के गुंडों और फॉसिस्ट हिंदुत्ववादियों ने 31 जनवरी 2012 को तिरूनेलवेली में हमारे नेताओं और 15  महिलाओं के समूह पर नृशंस हमला किया, जब वे केंद्र सरकार की विशेज्ञ टीम से बात करने जा रहे थे। अब सरकार इतनी ज्यादा और मनमानी तरीके से बिजली कटौती कर रही है जिससे लोगों में यह संदेश जाये कि राज्य में बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा जरूरी है। वे जनता में हमारे खिलाफ असंतोष और द्वेश फैला रहे हैं।

संक्षेप में कहें तो यह ‘‘डेविड और गोलियथ’’ की पुरानी कहानी जैसा है जिसमें भारत के आम लोग धनी पूंजीपतियों, बहुराष्ट्रीय निगमों, साम्राज्यवादी ताकतों तथा ग्लोबल परमाणु माफिया के साथ खड़ी सरकार से जूझ रहे हैं। उनके पास एफ.टी.आई., परमाणु ऊर्जा, विकास, परमाणु बम, सुरक्षा और सुपर पॉवर के दर्जे का सपना है। हमारी मांगें सुरक्षित बिजली, रोग मुक्त जीवन, साफ-सुथरा प्राकृतिक परिवेश, टिकाऊ विकास और सुरक्षित भविष्य है। उनका कहना है कि रूस के ये परमाणु संयंत्र सुरक्षित हैं और भूकम्प तथा सुनामी का सामना कर सकते हैं। लेकिन हम इनके ‘‘साइड इफैक्ट तथा दुष्प्रभावों के बारे में चिंतित हैं। हमारी यह लड़ाई अपने बच्चों तथा पोते-पोतियों, अपने पशुओं, पानी, समुद्र, हवा, जमीन तथा आसमान को बचाने के लिए है।

आप कृपया भारत के सुदूर दक्षिणी कोने में चल रहे इस संघर्ष पर नजर रखें और अपनी प्रार्थनाओं, ध्यान, विचार और बातचीत में हमें शामिल रखें। आप तमिलनाडु की मुख्यमंत्री सुश्री जे. जयललिता को इस खतरनाक परियोजना को रोकने के लिए पत्र लिख सकते हैं। आप प्रधानमंत्री को इसके लिए लिखें कि भारत को इस खतरनाक दिशा में न धकेलें, जब पूरी दुनिया परमाणु और ताप (थर्मल) ऊर्जा से मुक्ति के रास्ते पर है।

एक बार आप सबको दुबारा से धन्यवाद सहित हम अपनी व्यक्तिगत शुभेच्छाएं और शांतिवादी कामनायें भेजते हैं।

साभार,

एस.पी.उदयकुमार, एम. पुष्पारायण, फादर एम.पी. जेसुराज, एस. सिवा सुब्रमनियन, फादर एफ. जयाकुमार तथा अन्य. 28 फरवरी, 2012.

पीपल्स मूवमेन्ट अगेन्स्ट न्युक्लियर एजर्नी, 2012, इंदिताकराई, 627104

जिला-तिरूनेलवेली, तमिलनाडु, भारत. Email : koodankulam@yahoo.com
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एक दूसरे के संघर्षों से सीखना और संवाद कायम करना आज के दौर में जनांदोलनों को एक सफल मुकाम तक पहुंचाने के लिए जरूरी है। आप अपने या अपने इलाके में चल रहे जनसंघर्षों की रिपोर्ट संघर्ष संवाद से sangharshsamvad@gmail.com पर साझा करें। के आंदोलन के बारे में जानकारियाँ मिलती रहें।