जैतापुर परमाणु ऊर्जा परियोजना: विरोध में एकजुट होते लोग

वृहत मुम्बई और राज्य में विद्युत समस्या हल करने के उपाय के तौर पर राज्य सरकार ने फ्रांस की मदद से जैतापुर में परमाणु ऊर्जा संयंत्र की नींव रखी है। सरकार का दावा है कि इस संयंत्र से 10,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा, जो विश्व रिकार्ड होगा। परंतु एनरान कम्पनी का नाटक देख चुके स्थानीय किसान, पर्यावरणविद और मछुआरे इस परियोजना के विरोध में कमर कस चुके हैं।

जैतापुर कोंकण क्षेत्र में अवस्थित है। कोंकण हरा भरा इलाका है तथा यहां प्रचुरमात्रा में पानी भी उपलबध है। शायद इसी वजह से फ्रांस की कम्पनी ओरवा के साथ मिलकर न्यूक्लिअर पावर कारपोरेशन आफ इण्डिया ने यह परियोजना तैयार की है। इस परियोजना पर एक लाख करोड़ रुपये निवेश होगा। भारत में यह विदेशी निवेश की पहली परमाणु ऊर्जा परियोजना होगी। इस परियोजना हेतु 938 हेक्टेअर जमीन का अधिग्रहण प्रस्तावित है। पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरण के सरोकारों को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्तावित परियोजना का पर्यावरण अनापत्ति रोक रखा था, नवी मुंबई में प्रस्तावित नये हवाई अड्डे के लिए जिस तरह अज्ञात दबाव (?) के चलते मंत्रालय को पर्यावरण अनापत्ति देनी पड़ी थी, उसी तरह परमाणु संयंत्रों की बिक्री हेतु फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी के भारत आगमन से ठीक 4 दिन पहले इस परियोजना को मंत्रालय ने हरी झंडी दे दी।

योजना को हरी झण्डी मिलते ही स्थानीय लोगों ने विरोध को संगठित स्वर देना आरंभ कर दिया है। स्थानीय किसानों तथा मछुआरों ने कोंकण विकास समिति के बैनर तले उसी दिन प्रदर्शन किया जिस दिन राष्ट्रपति सरकोजी भारत आये। प्रदर्शनकारियों पर निमर्मतापूर्वक लाठीचार्ज करते हुए पुलिस ने तितर-बितर करने की कोशिश की।

इस बीच में कोंकण क्षेत्र में अपने गढ़ के ढहने की आशंका से परेशान शिव सेना ने इस आंदोलन के समर्थन की घोषणा कर दी है। जहां शिवसेना सीधे तौर पर विरोध में उतर आयी है वहीं एनरान योजना को ले आने वाली भा.ज.पा. इस प्रस्तावित योजना पर विचार के लिए एक कमेटी बनाकर अपना पल्ला झाड़ती दिख रही हैं। जहां तक कांग्रेस का सवाल है वह परियोजना के क्रियान्वयन के लिए दृढ़संकल्पत सी है।

इस इलाके में लगभग 1500 मछुआरे परिवार रहते हैं जो अनुमानतः 20 से 25 हजार टन मछली पकड़ते हैं जिससे 100 से 125 करोड़ का कारोबार प्रतिवर्ष होता है। मछुआरों का कहना है कि सरकार हमारी बेहतरी तो दूर रही हमें बर्बाद करने पर आमादा है। योजना में समुद्र का पानी इस्तेमाल होगा और फिर वही पानी समुद्र में वापस छोड़ दिया जायेगा जिससे समुद्री मछलियाँ बुरी तरह प्रभावित होंगी। इसका मछुआरों की जीविका पर अत्यन्त ही विपरीत प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरणविदों, मछुआरों तथा किसानों का कहना है कि इस परियोजना के लगने से पर्यावरण में परमाणु विकिरण आदि का जो जानलेवा प्रभाव पड़ेगा वह तो एक गंभीर मसला है ही परंतु इलाके की धान की खेती, आम के साथ ही साथ समुद्री जीवों पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। कोंकण विकास समिति इस परियोजना के विरोध में संघर्ष के लिए कटिबद्ध है।
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