आज भी वंचित है बिरसा का गाँव

गाँव के आदिवासियों को स्कूल और पानी चाहिए। स्कूल है, पर अध्यापक नहीं आते और पानी लाने के लिए औरतों को मीलों जाना पड़ता है।

बीते 17 अप्रैल, 2010 का बिरसा मुंडा के उलिहातु गाँव में जाकर जो कारुणिक दृश्य मैंने देखे, उससे मर्माहत हूं। बिरसा के गाँव और आसपास के जंगल खत्म हो रहे हैं। जो जंगल अरण्यजीवियों की आजीविका का एक मात्र साधन रहा है, वह क्यों खत्म हो रहा है? जंगलजीवी जंगल को माँ मानते हैं और माँ की तरह ही उसका सम्मान करते रहे हैं। भांति-भांति के लोकाचारों और अनुष्ठानों के जरिए सहस्त्रों वर्षों से अरण्य की रक्षा करते हुए उसकी विविध सम्पदा पर आश्रित होकर अरण्यजीवी खुद भी जीते रहे हैं, पर जंगल के खो जाने के बाद उनके पास विद्रोह के अलावा क्या चारा है?

अलिहातु और आसपास के गाँवों में मैंने लक्ष्य किया कि वन विभाग के सहयोग से ही जंगल-ध्वंस चल रहा है। झारखंड में (और अन्यत्र) बचे-खुचे जंगल की रक्षा के उपाय नहीं किये गये तो प्राकृतिक असंतुलन के सांघातिक नतीजे देखने पड़ेंगे।
अलिहातु में बिरसा मुंडा के भाई कानु मुंडा के प्रपौत्र सुखराम मुंडा 70 वर्ष के हो चले हैं। उनकी पत्नी भी वृद्धा हैं उनका रसोईघर टूट गया है। बिरसा के घर के सामने बिरसा स्मृति मंदिर है। वहां बिरसा भगवान प्रतिष्ठित हैं। गाँववाले उनकी रोज पूजा करते हैं। मैं वहां पास ही एक पेड़ के नीचे बैठी। गाँव वालों से मैंने पूछा कि उन्हें क्या दिक्कतें हैं? समवेत आवाज आयी - और कुंओं की दरकार है। पीने के पानी की भारी किल्लत है। पठन-पाठन का भी प्रबन्ध हो।पहाड़ के ऊपर स्थित इस गाँव में एक दो-मंजिला मकान है। गाँव वालों ने बताया कि यह स्कूल तो है, पर वहां शिक्षक नहीं आते। शिक्षक नहीं आते, सो छात्र भी नहीं आते। तो यह है, वहां की शिक्षा व्यवस्था। बिरसा का गाँव आज भी निर्धनता में सांस लेता हैं राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री हैं। शिबू सोरेन के राज में यही प्राप्य था? मैं अपने सहयोगी   बी.एम. लाल को धन्यवाद दूंगी कि उन्होंने बिरसा के गाँव को तेल निकालने वाली एक मशीन दी है, जिससे नीम, महुआ, और रेड़ी का तेल निकालकर गाँव वाले कुछ उपार्जन कर सकेंगे। अलिहातु (ब्लाक खूंटी, जिला पूर्वी सिंहभूम, झारखंड) एक आदिवासी गाँव है, क्या इसीलिए 2010 में भी वह वंचना का शिकार है? इस वंचना के खिलाफ और जल-जंगल-जमीन पर अधिकार वापस पाने के लिए ही बिरसा ने उलगुलानयानी महाविद्रोह किया था। 1889-1900 में छोटानागपुर में वह ऐतिहासिक विद्रोह चला था। महज पचीस वर्ष की आयु में बिरसा की असमय मौत से वह महान संग्राम भले दब गया, पर उसका असर आज भी विद्यमान है। 1878 में अंग्रेजों ने जब कुख्यात जंगल कानून लागू किया तो उसी के खिलाफ उलगुलान हुआ था, क्योंकि जंगल में रहने वाली एक विराट आबादी को जीविका का वैकल्पिक अवसर नहीं देकर उन्हें  जंगल से भगाकर तिल-तिल कर मरने को बाध्य किया गया था। अंग्रेजों के जंगल कानून का मकसद वनस्पतियों और वन्य प्राणियों का संरक्षण करना नहीं था, बल्कि जंगल को यूरोपीय ठेकेदारों और देसी महाजनों के हाथों बेचना था। यानी भारत की विपुल वन सम्पदा को लूटने की वह अंग्रेजों की चाल थी। आज स्वतंत्र भारत की सरकार वन क्षेत्रों को बड़े औद्योगिक घरानों को सेज बनाने के लिए दे रही है। बिरसा ने बहुत पहले अपने पिछड़े हुए आदिवासी समाज में जल-जंगल-जमीन के प्रश्न को लेकर चेतना जगायी थी। आज किसी न किसी रूप में समूची दुनिया को बिरसा के महासंग्राम में शरीक होना पड़ रहा है। कहा जा रहा है कि अगला युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा। जल-जंगल-जमीन के इस अन्योन्याश्रित सम्बन्ध को बिरसा ने उन्नीसवीं शती के आखिर में ही समझ लिया था। वह अपने समय से कितना आगे था। लेकिन उसका गाँव आज भी वहां है। बिरसा के गाँव व आसपास की महिलाओं को आज भी 14-14 किलोमीटर दूर जाकर पानी लाना पड़ता है। अनेकानेक आदिवासी गाँवों की यही दशा है और इसी कारण उनमें असंतोष भी है। यह असंतोष ही आदिवासियों को व्यापक रूप में संगठित होना सिखाता रहा है। आदिवासी जब अपने अधिकारों के प्रति सजग होंगे, तभी इंसान के रूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करने में समर्थ होंगे। -महाश्वेता देवी (हिन्दुतान से साभार)
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