खेती, ज़िंदगी और जमीन बचाने की जंग


किसानों ने भूमि अधिग्रहण के विरोध में घंटों जाम किया जयपुर-लुहारू हाईवे

नवलगढ़ में पिछले एक वर्ष से किसान भूमि अधिग्रहण के विरोध में धरने पर बैठे है। यह किसान अपनी उपजाऊ भूमि किसी भी कीमत पर सीमेंट कंपनियों को देने के लिए तैयार नहीं हैं। किसानों में सरकार के खिलाफ आक्रोश बढ़ता जा रहा है क्योंकि किसानों के 328 दिन के आंदोलन के बावजूद सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है। इसलिए 24 जुलाई 2011 को विस्थापित हो रहे 18 गांवों के हजारों किसान जबरन भूमि अधिग्रहण के विरोध में नारे लगाते हुए जयपुर-लुहारू हाईवे पर बैठ गए और जाम लगा दिया। संघर्ष समिति के संयोजक कैप्टन दीपसिंह शेखावत ने कहा कि सरकार आंख मूंद कर तमाशा देख रही है। पिछले 11 महीने से किसान धरने पर बैठा है लेकिन सरकार अधिग्रहण की कार्यवाही को जारी रखे हुए है। किसान अपनी जमीन किसी भी सूरत में नहीं देगे।  यह जाम 6 घण्टे तक चला तथा सरकार को चेतावनी देते हुए समाप्त किया गया।
भूमि अधिग्रहण, विस्थापन और अवैध खनन के खिलाफ राज्य स्तरीय सम्मेलन

जयपुर में 27 जुलाई 2011 को भूमि अधिग्रहण, अवैध खनन तथा विस्थापन के विरोध में  राज्य स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में प्रदेश भर में हो रहे आन्दोलनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। करीब 200 लोगों की उपस्थिति में सर्वसहमति से राजस्थान के विभिन्न जिलों में चल रहे जनसंघर्ष को एकजुट करने हेतु राजस्थान जनसंघर्ष मोर्चाका गठन किया गया। मोर्चे के गठन के बाद यह भी तय किया गया कि इसकी पहली बैठक में राज्यस्तर पर आन्दोलन को मजबूत करने की भावी कार्ययोजना बनाई जायेगी।

सम्मेलन की राय थी कि-

देश में जैसे-जैसे उदारीकरण की प्रक्रिया तेज होती जा रही है, उसी तेजी के साथ आम जनता को उसके हकों और अधिकारों से बेदखल करने का षड्यंत्र चल रहा है। जनता के हकों पर डाका डालने की इस मुहिम में सरकार, पूंजीपति, पुलिस और प्रशासनिक गठजोड़ बड़ी बेशर्मी के साथ जुटा हुआ है। देशी-विदेशी कंपनियों को जमीनी संसाधनों के दोहन के लिए दी जा रही इस छूट का सबसे भयावह पहलू विस्थापन के रूप में सामने आ रहा है। आजादी के बाद देशभर में करीब छह करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है।

विस्थापन की इस मार से राजस्थान भी अछूता नहीं है। राजस्थान में बड़े पैमाने पर जमीन का उपयोग बदला जा रहा है, (लैंड यूज चेंज) जिसके कारण लाखों लोगों पर विस्थापन की तलवार लटक रही है। पिछले सात-आठ वर्ष में राजस्थान में लाखों बीघा जमीन का उपयोग बदला गया है, जिसके कारण प्रदेश भर में लाखों लोगों को अपने जल-जंगल और जमीन जैसे संसाधनों से बेदखल होना पड़ा है। राजस्थान में बड़े पैमाने पर कृषि भूमि, गोचर भूमि, तालाब और जलाशयों की जमीन को व्यावसायिक, निजी उद्योग, खनन और निजी आवासीय योजनाओं के लिए बदला गया है। यह सारा खेल सरकारी जनविरोधी नीतियों और 90 बी जैसी धाराओं की आड़ में खेला जा रहा है। जमीन के उपयोग में बदलाव का पूरा फायदा मुनाफाखोर उद्योगपतियों, बड़े बिल्डर्स, भूमाफिया, खनन माफिया, भ्रष्ट नेता छुट भैये और अफसर उठा रहे हैं। पूंजीपति सरकारी गठजोड़ के खिलाफ राजस्थान के विभिन्न इलाकों में हो रहे विस्थापन विरोधी संघर्ष को भी बड़ी बेरहमी के साथ कुचलने के प्रयास हो रहे हैं। खनन और विस्थापन का विरोध करने वाले लोगों को झूठे  मुकदमों में फंसाया जा रहा है तो कई जगहों पर लोगों को गैर कानूनी हिरासत  में रखकर मारा-पीटा जा रहा है। पूंजीपतियों के हितों की समर्थक राजनीतिक पार्टियों के जनप्रतिनिधि भी बड़ी बेशर्मी के साथ खनन माफियाओं और उद्योगपतियों का साथ देने में जुटे हैं। 

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