कार्यवाहियाँ पूर्व निर्धारित फिर भी जारी है जन सुनवाइयों की नौटंकी


पर्यावरण विभाग की जांच संदेह के घेरे में। कोल वाशरी की बोलती तस्वीरें।
मामला ‘‘जिंदल कोल वाशरी’’ जन सुनवाई का


छत्तीसगढ़ प्रदेश के भ्रष्टतम पर्यावरण विभाग द्वारा फरवरी 2007 में जिंदल को रायगढ़ में कोल वाशरी निर्माण की स्वीकृति इस शर्त के साथ दी गयी थी कि 30 जून 2007 के पूर्व केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से विधिवत अनुमति लेनी होगी अन्यथा यह स्वीकृति स्वयमेव निरस्त मानी जायेगी। इस निर्धारित अवधि में न तो जन सुनवाई हुई और न ही पर्यावरण मंत्रालय ने जिंदल को स्वीकृति दी। लिहाजा पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव सदस्य ने 25 अगस्त 2007 को जिंदल को नोटिस जारी कर कोल वाशरी का निर्माण तत्काल रोकने के निर्देश दिये। साथ ही पर्यावरण विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी, रायगढ़ को स्थल निरीक्षण कर सात दिनों में रिपोर्ट देने और काम न रोके जाने की दशा में जिंदल के विरूद्ध कार्यवाही करने के निर्देश दिये।

नोटिस के जवाब में जिंदल द्वारा 11 सितंबर 2007 को पर्यावरण विभाग को पत्र लिखा गया कि कोल वाशरी का 80 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है और इस स्थिति में काम रोके जाने से उनके 1000 मेगावाट के पावर प्लांट से बिजली उत्पादन में देरी होगी। जिंदल के जवाब के पहले ही संघर्ष मोर्चा के जुझारू नेता जयंत बहिदार कलेक्टर और पर्यावरण विभाग को जिंदल द्वारा कोल वाशरी का निर्माण जारी रखने की शिकायत कर चुके थे। क्षेत्रीय पर्यावरण अधिकारी द्वारा न तो अपने उच्च अधिकारी के निर्देश का पालन कर कोल वाशरी निर्माण स्थल का निरीक्षण किया गया और न ही श्री बहिदार की शिकायत पर कोई कार्यवाही की गयी। कायदे कानून को तोड़ने में माहिर जिंदल ने न केवल कोल वाशरी का निर्माण पूरा कर लिया बल्कि कोयले की धुलाई कर पावर प्लांट में भेजना भी जारी रखा। विगत तीन वर्षों में विभाग के अफसरों के दौरे जिंदल की कोल माइंस के निरीक्षण के बहाने लगते रहे। लेकिन खदान के मुंहाने पर अवैध रूप से कार्यरत कोल वाशरी का जिक्र तक नहीं किया गया। मामला अभी भी फाइलों में दबा रहता यदि कोयला खदान का उत्पादन बढ़ाने और कोल वाशरी की पर्यावरणीय स्वीकृति के लिये जन सुनवाई निर्धारित नहीं की गई होती।

चूंकि 23 अक्टूबर 2010 को आयोजित जन सुनवाई के बहुत पहले से ही कोल वाशरी अवैध रूप से संचालित थी इसलिये 5 अक्टूबर 2010 को जयंत बहिदार और 9 अक्टूबर को जन चेतना द्वारा केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री श्री जयराम रमेश से लेकर जिला प्रशासन और पर्यावरण विभाग तक जन सुनवाई निरस्त कर जिंदल के विरूद्ध कार्यवाही करने की मांग की गई। सदैव किसी भी कीमत पर जन सुनवाई करवाने पर आमादा जिला प्रशासन ने जन सुनवाई निरस्त करने से साफ मना करते हुए शिकायतकर्ताओं को अदालत जाकर स्टे आर्डर ले आने की सलाह दे डाली। मतलब कि चोर की शिकायत करने जाओ तो पुलिस कहे कि चोरी तो होकर रहेगी, चोरी रुकवाना है तो अदालत का आदेश ले आओ। जैसे जैसे जन सुनवाई की तारीख नजदीक आती गई और तमनार में विरोध के स्वर उभरने लगे प्रशासन और पर्यावरण विभाग ने लोगों का आक्रोश शांत करने के लिये जन सुनवाई के मात्र पांच दिनों पहले कोल वाशरी का निरीक्षण करने का दिखावा किया।

तीन वर्षों से धूल खा रही फाइल को खोज कर, चोरी की जांच चोरों से करवाने की तर्ज पर पर्यावरण विभाग के तीन अधिकारियों ने 18 अक्टूबर को जिंदल की कोल वाशरी की तथाकथित जांच कर बताया कि कोल वाशरी बंद पाई गई। गौरतलब है कि निरीक्षण की जानकारी गारे व लिबरा इत्यादि गांवों के ग्रामीणों को हो गई थी और वे वाशरी के दरवाजे पर अधिकारियों के आने की राह देख रहे थे। फोन के द्वारा अधिकारियों को सूचित भी किया गया कि ग्रामीण उनसे मिलना चाहते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि दोपहर से वे इंतजार करते रहे लेकिन शाम 6 बजे तक भी अधिकारियों को न आते देख वे अपने घर चले गये।

जन सुनवाई से 3 दिन पहले 20 अक्टूबर 2010 को प्रभावित होने जा रहे गांव के लोगों ने सैकड़ों की संख्या में जुलूस की शक्ल में पूरे रायगढ़ शहर का चक्कर लगाते हुए रायगढ़ के कलेक्टर के सामने प्रदर्शन करके जन सुनवाई रद्द करने एवं जिंदल के खिलाफ कार्यवाही की मांग की तथा कलेक्टरेट के गेट पर नवीन जिंदल का पुतला फूंका। एक बार फिर से कलेक्टर ने जन सुनवाई रद्द करने से मना कर दिया और सहायक कलेक्टर को भेजकर प्रदर्शनकारियों का मांग पत्र मँगवाया।

जन चेतना के रमेश अग्रवाल ने बताया कि स्वीकृति के पूर्व निर्माण किये जाने की शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए मंत्रालय द्वारा हाल ही में 19 अगस्त 2010 को सर्कुलर जारी किया गया है जिसके अनुसार ऐसे मामलों में मंत्रालय द्वारा टी.ओ.आर. निरस्त अथवा लंबित किये जा सकते हैं। जाहिर है यदि टी.ओ.आर. ही निरस्त किये जाने का प्रावधान है तो जन सुनवाई स्वयमेव निरस्त हो जाती है और जन सुनवाई करवाने का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता। लेकिन प्रशासन है कि जिंदल जैसे प्रभावशाली उद्योग के सामने सारे नियम कायदों को ताक पर रख कर जन सुनवाई करवाने पर आमादा है। जिंदल एवं अन्य उद्योगों के खिलाफ आदिवासी अंचल में किस कदर आक्रोश है इसका अंदाज प्रशासन को बखूबी हो चुका है। फिर भी यदि जन सुनवाई करवायी जाती है तो खम्हरिया जैसी किसी अप्रिय स्थिति की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। ज्ञातव्य है कि गारे एवं खम्हरिया गांवों की जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों पर पुलिस तथा कंपनी के गुण्डों ने कातिलाने हमले किये थे और उल्टे ग्रामीणों के ऊपर आपराधिक धाराओं में मुकदमें भी दर्ज कर लिये गये थे।

अन्ततः 23 अक्टूबर 2010 को धौराभाँटा में जन सुनवाई का नाटक किया गया। कम्पनी की तरफ से सैकड़ों लोगों को अपने वाहनों में लादकर लाया गया, यह सब बेकार गया; क्योंकि कम्पनी की तरफ से लाये गये यह सारे लोग इतना नशे में थे कि वे बोलना तो दूर खड़े नहीं हो पा रहे थे। आन्दोलनकारी किसान 3-4 सौ की संख्या में मौजूद थे और उन्होंने अपनी आपत्तियाँ दर्ज करायीं तथा अपनी बातें जोरदार ढंग से रखीं। जैसा कि हर जन सुनवाई के साथ होता है जिला प्रशासन ने इस जन सुनवाई की भी रिपोर्ट बनाकर मंत्रालय को अग्रसारित कर दी होगी और अंतिम फैसला मंत्रालय लेगा। जिला प्रशासन एवं मंत्रालय के हित इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाते हैं। लोगों के अनुभव बताते हैं कि इन दोनों स्तरों पर लोगों का हित हाशिये पर ही ढकेल दिया जाता है।

गौरतलब है कि जन चेतना द्वारा नियम विरूद्ध जन सुनवाई को चुनौती देते हुए याचिका अपीलेट अथारिटी दिल्ली के समक्ष दायर की गई थी जिसमें एक साल बाद अथेना पावर की जन सुनवाई असंवैधानिक पाते हुए निरस्त कर दी गई थी। रमेश अग्रवाल, मोर्चा नेता जयंत बहिदार और आदिवासी मजदूर किसान एकता संगठन के संयोजक डा. हरिहर पटेल का साफ कहना है कि भले ही प्रशासन डंडे के जोर पर जन सुनवाई करने में सफल हो गया है लेकिन वे इस सरासर असंवैधानिक जन सुनवाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक लडेंगे और अंततः तमनार के आदिवासी ग्रामीणों को न्याय मिलेगा।
- राजेश त्रिपाठी, रायगढ़

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