साक्षात्कार, दिसंबर 2010


हम लगातार संघर्ष कर रहे हैं। दमन, उत्पीड़न, गिरफ्तारियां तथा फर्जी मुकदमें हमें डिगा नहीं सकते। हम जनवरी 2011 से बड़े पैमाने पर न्यायाग्रह आंदोलन करने जा रहे हैं। पू. सिंहभूम के जमशेदपुर तथा पोटका प्रखण्ड में भूषण एवं जिंदल की स्टील एवं ऊर्जा परियोजनाओं के खिलाफ अपने वन, नदी तथा पहाड़ और जीवन बचाने के लिए हम संघर्षरत हैं। इन कम्पनियों ने कुछ लोगों से थोड़ी बहुत जमीनें खरीद ली थीं तथा कुछ शेड वगैरह बना लिये थे। परंतु विक्रेताओं का मोहभंग हो चुका है वे भी अब कम्पनी के खिलाफ हैं।

आज स्थितियां एकदम बदल गयी हैं पहले आंदोलनकारियों पर मामूली धाराओं में मुकदमे कायम होते थे और लोग विरोध-प्रतिरोध को अपना राजनैतिक अधिकार मानते थे परंतु अब गंभीर धाराओं में मुकदमे संघर्षों के अगुआकारों पर इसलिए कायम किये जा रहे हैं जिससे उन्हें क्राइम कन्ट्रोल एक्ट जैसे काले कानूनों में निरूद्ध किया जा सके। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा तथा भा.ज.पा. जैसे      राजनीतिक दल अब आंदोलनों के विरोध में खुलेआम आ रहे हैं।

हमने विस्थापन, पलायन, भूमि अधिग्रहण के साथ ही साथ अकाल, भूख एवं रोजगार के मुद्दों को भी अपने संघर्ष में जोड़ा है।

1855-56 से लेकर 1937 तक समय-समय पर तिलका माझी, सिद्धु, कानू, बिरसा मुण्डा- उल गुलान तथा सिंगराई-विंदराई जैसे आदिवासी नायकों के संघर्षों ने हमेशा सत्ता को घुटने टेकने को विवश किया, परिणामतः यूल्स रूल्स, संथाल परगना टेनेंसी एकट, छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट और बिलकंन्सन्स रूल जैसे कानून बने जिसमें आदिवासियों की परम्परागत भूमि व्यवस्था को सत्ता ने स्वीकारा।

आज फिर से एक और उल गुलान की जरूरत है, हमारी कोशिश है वह जल्दी हो।

- कुमार चन्द मार्डी, जिंदल-भूषण विरोधी आंदोलन, पू. सिंहभूम (झारखण्ड)

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