सरकार एवं जे0 पी0 कम्पनी के खिलाफ ‘आवाज उठाओगे तो भुगतोगे’

कानून का मखौल इस तरह उड़ाया जा रहा है कि लगता ही नहीं कि यहां कानून का राज कायम है। कहने को तो तमाम अधिकार लोगों को दिये गये हैं परंतु जब इनका उपयोग आप शासन-प्रशासन या कारपोरेट घरानों की मनमर्जी के खिलाफ करने के लिए आगे बढ़ते हैं तब समझ में आता है कि हम लोकतंत्रमें नहीं बल्कि कारपोरेट तन्त्रमें जीवित रहने को विवश किये जा रहे हैं और हमारी आस्था लोकतन्त्र से डिगने को मजबूर होती जाती है।
उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना गंगा एक्सप्रेस-वे की पर्यावरणीय स्वीकृति में बरती गयी अनियमितताओं को उजागर कर इसे मानवीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद से खारिज कराने वाले आर.टी.आई. कार्यकर्ता श्री प्रदीप कुमार शुक्ल  लगातार शासन-प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार को परत दर परत लगातार उजागर करते चले आ रहे हैं किन्तु उनके भ्रष्टाचार विरोधी इस अभियान से परेशान शासन-प्रशासन, और कंपनी उनको फर्जी मुकदमों में उलझाकर परेशान करने पर तुल गया है।

श्री शुक्ल को गत दो वर्षों से शासन-प्रशासन द्वारा लगातार धमकी दी जा रही है किन्तु तमाम धमकियों व दबाव को नजर अन्दाज कर आगे बढ़ रहे श्री शुक्ल के ऊपर गत दिनों मिर्जापुर (उ. प्र.) जिले की पुलिस एक फर्जी मुकदमा दर्ज कर उनके ऊपर अलोकतांत्रिक तरीके से दबाव देने लगा है कि यदि पुलिस विभाग में दाखिल आर.टी.आई. आवेदन को यदि वे वापस नहीं लेते हैं तो इसका परिणाम उनको भुगतना पड़ेगा।

यह मामला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन संरक्षित स्मारक दुर्गा खोहचुनार जिला मिर्जापुर (उ. प्र.) के निषिद्ध क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक महत्व के दुर्गा मन्दिर की प्राचीन पत्थर की सीढ़ियों को तोड़कर उसके स्वरूप में परिवर्तन सम्बन्धी अपराधिक कृत्य से जुड़ा हुआ है। चार वर्ष से चल रहे मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब राष्ट्र की सांस्कृतिक एवं जिले की एक ऐतिहासिक धरोहर को क्षति पहुंचाने वालों के विरूद्ध कठोर कार्यवाही तथा क्षतिग्रस्त हिस्से का जीर्णोद्धार करने की लगातार मांग करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता श्री प्रदीप कुमार शुक्ल के द्वारा सूचना का अधिकार कानून के तहत पूछे गये सवालों का पूरा और सही जवाब देने से अपना पल्ला छुड़ाती पुलिस श्री शुक्ल के ऊपर एक साजिश के तहत धारा 323, 504 आई.पी.सी. व एस.सी., एस.टी. एक्ट का फर्जी मुकदमा थोपकर दबाव बनाने में जुट गयी है।

ज्ञातव्य हो कि चार वर्ष पूर्व मन्दिर की सीढ़ियों को तोड़कर क्षतिग्रस्त करने के मामले में पुरातत्व विभाग की तहरीर पर डेढ़ वर्ष तक चुनार थाने में एफ.आई.आर. नहीं दर्ज किया गया। सूचना कानून के तहत कार्यवाही की प्रगति पूछने पर दबाव में एफ.आई.आर. तो दर्ज की गयी लेकिन पुलिस ने मामले की लीपापोती कर डाली। इसी बीच चुनार एस.एच.ओ. तथा पुलिस अधीक्षक मिर्जापुर का कार्यालय     वातानुकूलित बन गया। इसी के साथ क्षेत्र में यह चर्चा होने लगी कि यह कार्य जे.पी. सीमेन्ट की चुनार इकाई ने कराया है। इसको गंभीरता से लेकर श्री शुक्ल ने सूचना के अधिकार के तहत पुलिस कार्यालय से इसके निर्माण सम्बन्धी ब्यौरे की जानकारी मांगी। आर.टी.आई. आवेदन पहुंचते ही जिले के पुलिस अधिकारियों के हाथ-पाव फूलने लगे। जवाब देना उनके गले की हड्डी बन गया। उस दौरान तत्कालीन एस.एच.ओ. चुनार ने श्री शुक्ल को धमकी दे डाली थी कि यदि सूचना कानून के तहत अभी कोई कार्यवाही की गयी तो दो-चार मुकदमे में फंसा कर हाथ-पैर तुड़वा दिये जाएंगे, किन्तु धमकी से प्रभावित हुए वगैर श्री शुक्ल ने इसकी शिकायत पुलिस के उच्च अधिकारियों से की, पर पुलिस अधिकारियों के द्वारा कोई भी कार्यवाही नहीं की गयी।

सूचना आयोग ने मामले को संज्ञान में लेकर सुनवायी प्रारंभ की जो लगातार चल रही है। प्रारंभ से झूठा एवं अधूरा जवाब देती आ रही पुलिस जब अपने ही बुने जाल में उलझ गयी तो श्री शुक्ल के विरूद्ध षड्यंत्रकारी नीति के तहत फर्जी मुकदमे दर्ज कर सूचना पर सहमत करने का दबाव बनाने लगी है। इधर श्री शुक्ल ने इसकी शिकायत राज्य सूचना आयोग तथा उच्च अधिकारियों से करा के तत्काल जांच कर दोषियों के विरूद्ध कानूनी कार्यवाही करने तथा अपनी सुरक्षा की मांग की है। - राजेन्द्र मिश्र, चुनार, मिर्जापुर, उ. प्र.
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